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नेपाल के नागरिकता संशोधन प्रस्ताव में बदलाव से भारत पर क्या पड़ेगा असर?

Tue, 23 Jun 2020 11:15 AM IST
Tanuja Yadav बीबीसी

सार

  • नेपाल की संसद से नागरिकता संशोधन कानून का प्रस्ताव पारित
  • प्रस्ताव पर सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाल कांग्रेस में मतभेद
  • नेपाली पुरुष के साथ शादी करने पर सात साल बाद मिलेगी नागरिकता
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Nepal Parliament - फोटो : Social Media
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विस्तार
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नेपाल की संसद की प्रतिनिधि सभा की राज्य व्यवस्था समिति ने नागरिकता कानून में संशोधन के सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रस्ताव को बहुमत से पारित कर दिया है। नए प्रस्ताव के तहत नेपाली पुरुषों के साथ विवाह करने वाली विदेशी महिलाओं को शादी के बाद नेपाल की नागरिकता पाने के लिए सात साल का लंबा इंतजार करना होगा। 

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हालांकि समिति से अधिकतर सदस्यों ने इस प्रस्ताव को सहमति दे दी है लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस और कुछ अन्य पार्टियों ने इस विवादित संशोधन प्रस्ताव का विरोध किया है।

नेपाली नागरिकरता यानी अंगीकृत नागरिकता पाने के लिए विदेशी महिला को सात साल बाद अपनी पुरानी नागरिकता त्यागने का प्रमाण या उससे जुड़ा प्रमाण दिखाना होगा। पार्टी के सचिवालय की बैठक में ये फैसला लिया गया है। ये कानून भारत सहित सभी विदेशी महिलाओं पर लागू होगा।
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सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि नागरिकता कानून 2006 में संशोधन करना पड़ोसी देश भारत जैसा कदम उठाना है। भारत में भारतीय पुरुष से शादी करने वाली विदेशी महिला को कानूनी तौर पर नागरिकता का अधिकार पाने के लिए सात साल का इंतजार करना पड़ता है।

वहीं कम्युनिस्ट पार्टी, विपक्षी नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि शादी के बाद किसी महिला के नागरिकता पाने के कानूनी हक के मूलभूत हक पर इस प्रस्ताव का असर पड़ेगा।

इन नेताओं का कहना है कि कम्युनिस्ट पार्टी की जिस बैठक में नए प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है उसमें नौ पुरुष सदस्य थे। उनका कहना है कि भारत और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले नागरिकों के बीच अंतर-देशीय शादियां सदियों से होती रही हैं और इस नए प्रस्ताव से नागरिकों के बीच के आपसी संबंध बिगड़ सकते हैं।

नेता ये डर भी जता रहे हैं कि नागरिकता कानून को लेकर जारी विवाद से नागरिकता सुधारों और इस नए कानून को संसद से मंजूरी मिलने में देरी हो सकती है और इसका असर नागरिकता सर्टिफिकेट का इंतजार कर रहे लोगों पर पड़ सकता है।

नेपाल में नागरिकता का सर्टिफिकेट जरूरी प्रमाण पत्र होता है जिसकी जरूरत ढेरों काम के लिए होती है, यहां तक मोबाइल फोन के सिम कार्ड लेने के लिए भी इसे दिखाना होता है।

नागरिकता कानून 2006 में लाए गए कानून में नेपाली पुरुष से शादी करने वाली विदेशी महिला की नागरिकता सबसे विवादित मुद्दों में से एक है लेकिन दो साल बाद भी इस मुद्दे पर विवाद जारी है और अब इस नए प्रस्ताव के बाद विवाद और गहरा रहा है। 

नागरिकता कानून 2006 को लेकर हुई संसदीय समिति की बैठक में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं ने मांग की थी कि इस कानून में विदेशी महिलाओं को एक ही वक्त में नागरिकता और 'सिंदूर' देने के प्रावधान को खत्म किया जाए। नेताओं का कहना था कि इस प्रावधान की कीमत नेपाल को चुकानी पड़ सकती है।

नागरिकता कानून 2006 के तहत शादी के तुरंत बाद ही विदेशी महिला को नेपाल की नागरिकता मिल जाती है। कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबास चंद्र नेमबांग ने बैठक में कहा कि नागरिकता के प्रावधान में बदलाव का ये प्रस्ताव भारत को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। 

हालांकि मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस नेता बिमलेन्द्र निधि विदेशी महिलाओं को लंबे इंतजार के बाद नागरिकता देने के इस नए प्रस्ताव का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि नागरिकता कानून 2006 में इस संबंध में उचित प्रावधान हैं जिसे बदले जाने की जरूरत नहीं है।

निधि नेपाल दक्षिण में स्थित तराई मधेश इलाके के जाने-माने शहर जनकपुरधाम से हैं जहां भारत और नेपाल के नागरिकों के बीच शादियां आम बात है। माना जाता है कि सैंकड़ों साल पहले यहां पर जन्मी जानकी की शादी भारत के अयोध्या के राजकुमार राम से हुई थी।

राजेन्द्र महतो नई बनी जनता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं जिसमें पूर्व मधेशी नेता और पूर्व माओवादी नेता बाबूराम भट्टाराई शामिल हैं। बीबीसी हिंदी को उन्होंने बताया कि नागरिकता संशोधन कानून में प्रस्तावित सात साल के इंतजार के प्रावधान के साथ दो बड़ी समस्याएं हैं।

वो कहते हैं कि पहला तो ये कि इससे महिला के उस मूल अधिकार का उल्लंघन होगा जिसके अनुसार शादी के बाद ही उसे नेपाल की नागरिकता मिल जानी चाहिए। दूसरा ये कि इसका बुरा असर भारत और नेपाल के लोगों के बीच के रिश्ते पर पड़ेगा। 

रामायण काल या फिर शायद उससे पहले से दोनों के बीच अंतर-देशीय शादियां होती रही हैं और लोगों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है जो इससे खत्म हो सकता है। उन्होंने कहा कि ये नेपाल के तराई और सीमावर्ती भारत के लोगों के बीच इस तरह के रिश्तों को एक तरह से खत्म करने की कोशिश है और ये हमारे सांस्कृतिक रिश्तों पर भी हमला है। 

तराई के इलाके में रहने वाले लगभग सभी परिवारों के वैवाहिक संबंध भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और दूसरे पड़ोसी राज्यों में रहने वालों से हैं। ये प्रस्ताव अगर कानून बन गया तो इसका गहरा असर होगा।

नागरिकता कानून में संशोधन के लिए सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रस्तावित से वो नेता भी नाराज हैं जो महिलाओं के भेदभाव खत्म करने के पक्ष में हैं। पार्टी की ही नेता और विधायक बिंदा पांडे ने नेपाल की नागरिकता देने में पुरुष और महिलाओं के बीच किए जाने वाले भेदभाद को खत्म करने की बात करती हैं।

पांडे ने काठमांडू पोस्ट को बताया कि कि हमारी पार्टी की मौजूदा संरचना में खुद के दस्तावेजों का पालन नहीं किया जा रहा और न ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का। नेपाली समुदाय में अब महिला-मुक्त क्षेत्र स्वीकार्य नहीं हैं। 

उनका कहना है कि उनकी मुहिम इस कारण है क्योंकि नेपाल के मौजूदा नागरिकता कानून में नेपाली महिला से शादी करने वाले विदेशी पुरुष के लिए नेपाल की नागरिकता पाना और भी मुश्किल हो गया है।

तराई इलाके से कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रभु शाह ने भी पार्टी के आला कमान के फैसले पर अपना विरोध जताया है। ऑनलाइनखबर के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि इसका असर दोनों देशों के लोगों के आपसी संबंधों पर पड़ सकता है ऐसे में इस फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।

वहीं संवैधानिक मामलों के जानकार बिपिन अधिकारी इस नए संशोधन में कोई समस्या नहीं देखते। वो कहते हैं कि 2015 में नेपाल के अपनाए संविधान में नेपाल में जन्म लेने वाले को नागरिकता देने का प्रावधान है और इस लिबरल प्रावधान को बदलने की अब कोशिश की जा रही है।

बीबीसी हिंदी को उन्होंने बताया कि नेपाल में शादी करने वाली विदेशी महिला को नागरिकता के मुद्दे में कोई परेशानी नहीं दिखती। भारत, अमरीका समेत कई और देशों में इस तरह का प्रावधान है। मुझे लगता है कि नागरिकता के लिए विदेशी महिला के लिए इंतजार का वक्त रखा जाना सही है। नागरिकता कोई ऐसी चीज नहीं जो थाल में सजा कर किसी के सामने पेश की जाए, इसे भी कमाया जाना चाहिए।

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