एस. एन. सुब्बाराव
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प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक और पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. एसएन सुब्बाराव का बुधवार सुबह निधन हो गया। डॉ. सुब्बाराव का पूरा जीवन समाजसेवा को समर्पित रहा है। मूल रूप से बेंगलुरु से जुड़े रहे सुब्बाराव ने ही 1972 में नामचीन डकैतों का आत्मसमर्पण करवाया। उन्होंने 1954 में पहला गांधी आश्रम, बागियों के लिए कुख्यात चंबल के जौरा गांव में 10 माह तक चलाया। अपने इस आश्रम के जरिए उन्होंने 1972 में कुख्यात डकैत मोहन सिंह, माधो सिंह सहित 600 से अधिक डकैतों का आत्मसमर्पण करवाया।
लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संरक्षक रघु ठाकुर ने सुब्बाराव के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि सुब्बाराव जी का निधन एक राष्ट्रीय क्षति है। सुब्बाराव जी को लोग भाई जी के नाम से जानते थे। उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में आजादी के आंदोलन में हिस्सेदारी की और जेल गए। महात्मा गांधी के विचारों के प्रभाव में वे जीवन दानी बन गए। उन्होंने सारा जीवन सादगी से बिताया। एक हाफ पेंट सफेद आधी बांहों की कमीज उनकी स्थाई वेशभूषा थी। उन्होंने काफी लोगों को गांधी के विचारों से अवगत कराया और शिक्षित किया। जोरा में जो मुरैना जिले में है उन्होंने अपना आश्रम बनाया। यहां वे लंबे समय तक रहे और लोगों के बीच में काम करते रहें।
ठाकुर ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि आसपास के जिलों के आदिवासियों को शिक्षित संगठित और जागृत करने के लिए वे निरंतर कार्य करते रहे। जब पहला दस्यु समर्पण हुआ था जिसमें आचार्य विनोबा भावे की भूमिका थी उसमें भी सुब्बाराव ने प्रमुख भूमिका अदा की थी। बाद में जयप्रकाश जी के समक्ष जो आत्मसमर्पण उस समय के दस्युयों ने किया उसमें भी स्वर्गीय सुब्बाराव की भूमिका थी। हम लोगों ने जोरा में 1982 में एक दस्यु समर्पण के लिए सम्मेलन किया था।
हालांकि इसमें सरकार का सहयोग नहीं था अतः सरकार ने भारी मात्रा में सशस्त्र बल पहुंचा कर समर्पण करने वाले दस्युओं की एनकाउंटर करने की योजना बनाई तथा उस क्रांतिकारी आयोजन को एक प्रकार से रोक दिया। परंतु सुब्बाराव ने उस आयोजन में हिस्सेदारी की और भूमिका अदा की। अनेकों बार मेरी उससे मुलाकात होती रही कई कार्यक्रमों में हम लोग साथ रहे। वे अपने समय का बेहतर प्रबंधन करते थे और शायद ही कभी खाली बैठते हो। 92 वर्ष के आयु में भी वह बेहद सक्रिय थे और देश के युवाओं से लगातार जुड़े रहते थे।