नेताजी ने आजादी की लड़ाई को नए आयाम पर पहुंचाया और विदेशी सरजमीं पर दुनिया की दूसरी ताकतों के साथ मिलकर अंग्रेजों को चुनौती दी... महानदी के किनारे पर बसे कटक में जब आप उड़िया बाजार की ओर चलते हैं तो यह सोचना भर ही रोमांचक है कि आजादी की लड़ाई के महान योद्धा की जन्मभूमि से आप रूबरू होंगे...
जेल से लेकर रेडियो रुम तक
आजादी की लड़ाई में उनके हर जेल प्रवास की पूरी कहानी संग्रहालय में दर्शाई गई है। एक ब्लॉक को जेल की तरह बनाया भी गया है। बताया गया है कि 17 जनवरी 1941 की सुबह लगभग डेढ़ बजे सुभाष चंद्र बोस मुस्लिम वेशभूषा में घर से निकल गए थे। अंग्रेजों को भनक तक नहीं लगी थी। उनके भतीजे ने उन्हें गाड़ी से छोड़ा और वह लंबी यात्रा करते हुए काबुल तक पहुंच गए। वह अपने साथ बस भगवद् गीता और मां काली की एक तस्वीर ले गए थे।