पिछले साल लाल किला की घटना के बाद जब आंदोलन सिमटने की बात हो रही थी, तो राकेश टिकैत 'रो' पड़े थे। नतीजा, किसान दोबारा से जुड़ गए। इस बार वैसी नौबत नहीं आई है। सब एक साथ लड़ने आए थे और लड़ रहे हैं। केंद्र को सच की रोशनी में किसानों की बात माननी होगी। इतना तय है कि चार दिसंबर को एसकेएम की बैठक में जो फैसला होगा, वह सामूहिक होगा। उसमें यह नहीं देखा जाएगा कि पंजाब के किसान संगठन क्या चाहते हैं और यूपी के किसान नेताओं की क्या राय है।
किसानों की मांगों के लिए लड़ेंगे, तरीका बदलकर
ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यवान का कहना है, किसान संगठनों के कुछ नेता, कभीकभार चर्चा के दौरान बहक जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे आंदोलन से दूर हैं। सरकार, आंदोलन को तोड़ने के लिए तैयार बैठी है। पंजाब के कई किसान नेता राजनीति में हाथ आजमाने का समर्थन कर रहे हैं। टिकैत या कोई दूसरा नेता, अभी एसकेएम से बाहर नहीं गए हैं। सरकार अपने लंबे-चौड़े प्रचार तंत्र से झूठ फैला रही है। अभी तो किसानों की बहुत सी मांगें बाकी हैं। एमएसपी, किसानों पर दर्ज केस वापस कराना और शहीदों के परिजनों को मदद, ऐसी कई मांगों पर संघर्ष जारी रहेगा। कोई संगठन, इधर-उधर हो सकता है, लेकिन एसकेएम, मैदान में है और आगे भी होगा। ये बात सही है कि किसान संगठनों के बीच एक 'संघर्ष' की स्थिति बनी हुई है।
बतौर सत्यवान, कोई भी आंदोलन सदैव एक जैसा नहीं रहता। उसके चरणों में बदलाव आता रहता है। तीनों कृषि कानून रद्द होने के बाद अब आंदोलन का एक चरण पूरा हो गया है। एसकेएम, इसी आधार पर आगे की राह तय करेगा। लंबे समय से लोग इस आंदोलन से जुड़े हैं। सामान्य लोगों ने भी आंदोलन के चलते दिक्कतें उठाई हैं। अगर पहले की तरह आंदोलन चलता रहा तो लोगों से दूरी बढ़ जाएगाी और उनकी नाराजगी भी बढ़ सकती है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर अंतिम फैसला होगा। सरकार भी दबाव में है, तो दूसरी ओर किसान संगठन भी दबाव में हैं। संयुक्त किसान मोर्चो की बैठक में इस तरह का फैसला लिया जाएगा, जिससे किसान आंदोलन और ज्यादा मजबूत होगा, भले ही उसका स्वरूप बदल सकता है।