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कूटनीतिक रिश्तों पर असमंजस: पांच मुल्कों को छोड़ दुनियाभर में बंद हो गए अफगानी दूतावास, ज्यादातर अधिकारी हुए शरणार्थी

सार

विदेशी मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व अधिकारी डॉक्टर जेएन रेड्डी कहते हैं कि तख्तापलट के बाद ज्यादातर देशों के दूतावासों का यही हाल होता है, जो अफगानिस्तान के दूतावासों का हुआ। दुनिया भर में अफगानिस्तान के दूतावासों में अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार के अधिकारी ही कूटनीति रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए तैनात किए गए थे। जो अधिकारी विदेश में दूतावास में तैनात थे उनकी रिपोर्टिंग सरकार को थी न कि तालिबान को...
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नई दिल्ली स्थित अफग़ान दूतावास - फोटो : wikipidia
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विस्तार
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अफगानिस्तान में 15 अगस्त को हुए तख्तापलट के साथ पाकिस्तान, चीन, दोहा, ईरान और टर्की को छोड़कर सभी देशों में अफगानी दूतावास बंद हो गए। इन दूतावासों में काम करने वाले अफगानिस्तान के बड़े से बड़े अधिकारी उसी मुल्क में शरणार्थी बनकर रह गए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दुनिया के मुल्कों में बंद हुए अफगानी दूतावास दोबारा शुरू हो पाएंगे या नहीं। हालांकि तालिबान ने दुनिया भर के देशों से अपील की है कि वह अपने दूतावासों को काबुल में शुरू करें और अफगानिस्तान के दूतावासों को अपने देशों में एक प्रक्रिया के बाद उनको शुरू करने की अनुमति दें।

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विदेशी मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व अधिकारी डॉक्टर जेएन रेड्डी कहते हैं कि तख्तापलट के बाद ज्यादातर देशों के दूतावासों का यही हाल होता है, जो अफगानिस्तान के दूतावासों का हुआ। दुनिया भर में अफगानिस्तान के दूतावासों में अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार के अधिकारी ही कूटनीति रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए तैनात किए गए थे। जो अधिकारी विदेश में दूतावास में तैनात थे उनकी रिपोर्टिंग सरकार को थी न कि तालिबान को। यही वजह है कि सत्ता बदलने के साथ दूतावासों की पूरी रिपोर्टिंग अफगानिस्तान सरकार को बंद हो गई और दुनिया भर के देशों में चल रहे अफगानी दूतावास पूरी तरीके से डिप्लोमेटिक रिश्तो के लिए बंद हो गए।

कभी दिल्ली के अफगानिस्तान दूतावास में रहे एक बड़े अधिकारी जो अब दक्षिण एशिया के किसी दूसरे देश में तैनात हैं, उनका कहना है कि वह अब एक तरीके से उस देश में शरणार्थी बनकर रह रहे हैं। क्योंकि काबुल जाने जैसे हालात नहीं है और डिप्लोमेटिक रिश्ते चलाने की कोई वजह सामने नजर नहीं आ रही है। उक्त अधिकारी का कहना है कि दुनिया के ज्यादातर देश तालिबान से फिलहाल रिश्ता नहीं रखना चाहते हैं। इसलिए अफगानिस्तान सरकार के दौरान तैनात किए गए सभी अधिकारी अलग-अलग देशों के अलग-अलग दूतावासों में निष्क्रिय हो चुके हैं और ज्यादातर शरणार्थी के तौर पर रहने को मजबूर भी हैं। इन अधिकारियों का अपने देश के लिए डिप्लोमेटिक रिश्तो को चलाने का कोई भी रोल नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में स्थिति न सिर्फ दुविधा की बनी हुई है बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने का भी बड़ा संकट भी सामने आ गया है।
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अफगानिस्तान में हुए तख्तापलट के बाद ज्यादातर देशों ने काबुल समेत अफगानिस्तान के अन्य प्रमुख शहरों में तैनात दूतावासों को बंद कर दिया था। लेकिन चीन, पाकिस्तान, दोहा और टर्की समेत ईरान ने अपने दूतावासों को बंद नहीं किया था। यही वे पांच मुल्क हैं जहां पर अफगानिस्तान के दूतावासों को चलाया जा रहा है। हालांकि विदेश मामलों के जानकारों का कहना है इन पांचों मुल्कों के दूतावासों में तैनात अफगानिस्तान के अधिकारियों के लिए बड़ी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। क्योंकि यह सभी पांचों देश सीधे तौर पर तालिबान से बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में दूतावासों का कोई विशेष योगदान नहीं बन पा रहा है। दूतावास में तैनात अधिकारियों का भी भविष्य क्या है, इसकी भी कोई तस्वीर साफ नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं जिस तरीके से अफगानिस्तान में तख्तापलट हुआ है उससे तालिबानी किसी भी दशा में विदेश में तैनात अफगानी दूतावासों के अधिकारियों को साथ नहीं रखेंगे। तालिबानी अपने ही लोगों को विदेशों में तैनात करेंगे अगर वह देश इसकी अनुमति देगा तो। ऐसे में पूर्ववर्ती अधिकारी या तालिबान के लिए काम करें या फिर वह उसी मुल्क में पनाह लेकर अपनी नई जिंदगी शुरू करें।

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भारतीय विदेश सेवा से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि आधिकारिक तौर पर तो दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में दूतावासों को बंद नहीं किया गया है लेकिन वह पूरी तरीके से निष्क्रिय जरूर हो चुके हैं। वह कहते हैं कि बड़े देशों के दूतावासों में काम करने वाले ज्यादातर अधिकारी और उनके परिवार की दोहरी नागरिकता होती है। ऐसे में उनके पास उसी मुल्क में शरण लेने का एक विकल्प भी रहता है। उनका कहना है ज्यादातर निष्क्रिय और बंद हो चुके अफगानी दूतावास के अधिकारियों ने उसी देश में पनाह ले ली है। अब इन मुल्कों में अफगानी दूतावासों को दोबारा कब शुरू किया जाएगा, इसके सवाल पर उक्त अधिकारी का कहना है एक बार अफगानिस्तान में सरकार का गठन हो जाए, उसके बाद दुनिया भर के डिप्लोमेटिक रिश्तों को चलाने के लिए तालिबान अपने स्तर पर बातचीत शुरू करेगा। जो देश तालिबान के रिश्तों को चलाना चाहेंगे, वही देश अपने मुल्कों में दूतावासों को फिर से सक्रिय करेंगे अन्यथा उस देश के दूतावास पूरी तरीके से बंद हो जाएंगे।

अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज हुए तालिबानियों ने दुनिया के देशों से अपील की है कि वह अपने देशों के दूतावासों को अफगानिस्तान में दोबारा शुरू करें। तालिबानी प्रवक्ता ने अपने एक बयान में कहा है कि उनकी सरकार को दुनिया के देश मान्यता दें और दूतावासों को शुरू कर सरकार को सामान्य रूप से चलाने की आम सहमति भी मिले। विदेशी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है तालिबानियों की सरकार को हो सकता है कुछ देश स्वीकार कर लें, लेकिन ज्यादातर देशों ने अभी भी न अपने दूतावासों को अफगानिस्तान में शुरू करने की योजना बनाई है और न ही अफगानिस्तान के दूतावासों को अपने देशों में सक्रिय करने की कोई योजना है।
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