यमुनानगर। कपालमोचन मेले से पांच किलोमीटर दूर गांव संधाय में राजा संध के टीले को श्रद्धालु ईंट-पत्थर के अलावा जूते-चप्पल मारने जरूर पहुंचते हैं। इसके बाद टीले के पास ही बने गुरुद्वारा साहिब में माथा भी टेकने के लिए जाते हैं। श्रद्धालु आते और जाते दोनों समय ही इस प्रथा को निभाते हैं।
श्रद्धालु राजा संध को गालियां भी देते हैं। इससे कुछ की दूरी पर माता ग्यानी सती का मंदिर भी बना है। इस मंदिर में श्रद्धालु माथा जरूर टेकते हैं। ऐसी पुरानी कहानी है कि यहां कभी राजा संध का महल हुआ करता था। एक सती के श्राप के कारण वह मिट्टी में तब्दील हो गया। मान्यता है कि महाभारत काल में यह स्थान सिंधू वन के नाम से प्रसिद्ध था। यहां पर अन्यायी राजा संध राज करता था।
उसी के कारण यहां का नाम जरासंधाय पड़ा जो कालांतर में संधाय बन गया। राजा अपने साम्राज्य में होने वाली शादियों की डोली लूटकर संधाय स्थित राजमहल में लाकर उनकी इज्जत से खेलता था। जनता परेशान थी, लेकिन कुछ कर पाने में असमर्थ थी। एक दिन राजा संध ने एक ऋषि कन्या सती ग्यासनी देवी पर कुदृष्टि डाली।
वह उन्हें उठाकर अपने महल में ले गया, लेकिन वह स्नान करने का बहाना बनाकर महल से भाग निकलीं। राजा उसके पीछे-पीछे गया। ग्यासनी देवी ने उसे श्राप दिया कि जिस महल में वह सुहागिनों की इज्जत से खिलवाड़ करता है, वह जल्द ही बर्बाद हो जाएगा। राजा से बचने के लिए वह महल के पास बने तालाब में सती हो गई। श्राप के कारण महल खंडहर में तब्दील हो गया। संवाद
मंदिर जाने से पहले सरोवर किनारे लगाया जाता है आम का पौधा
टीले से कुछ ही दूरी पर माता सती का मंदिर है। सेवादार रूलदाराम बताते हैं मंदिर में माथा टेकने से पूर्व माता सती के दो एकड़ में बने सरोवर में माथा टेेका जाता है। सरोवर के किनारे श्रद्धालु आम का पौधा लगाते हैं, उसके बाद मंदिर में माथा टेका जाता है। आम का पौधा लगाने से व्यक्ति के सभी कष्ट मिट जाते हैं।