हीद की विरांगना रेशमा देवी व बेटा मुकेश शहीद निहाल सिंह गोदारा की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए?
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चोपटा। निहाल सिंह गोदारा की शहादत का दिन सरकार, प्रशासन व नेताओं ने तो भूला दिया लेकिन शहीद की पत्नी रेशमा देवी कभी नहीं भूल सकती। वीरवार को गांव खेड़ी में शहीद निहाल सिंह गोदारा की 22वीं पुण्यतिथि पर स्मारक स्थल पर शहीद की पत्नी रेशमा देवी ने ही शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण व पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
लेकिन सरकार व प्रशासन व ग्राम पंचायत की तरफ से कोई अधिकारी व कर्मचारी नहीं पहुंचा। जिसको लेकर शहीद के परिजनों में रोष व्याप्त है। अमर शहीद सम्मान संगठन की ओर से रामकृष्ण खोथ, मंगतू राम बैनीवाल, मनीष कुमार, अजय कुमार, प्रवीण कुमार, राजवीर ने शहीद की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन किया। इस मौके पर अमर शहीद सम्मान संगठन की ओर से वीरांगना रेशमा देवी को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। शहीद परिवार का कहना है कि आम तौर पर सरकार घोषणा करके भूल जाती है। देश की रक्षा के लिए जान देने वाले जांबाज जवानों की शहादत को भूलना उनकी शहादत का घोर अपमान है।
शहादत से पहले चार आतंकी किए थे ढेर
सीमा सुरक्षा बल की 21वीं बटालियन का जवान निहाल सिंह गोदारा निवासी खेड़ी 11 नवंबर 1999 को कश्मीर में देश की सीमा की रक्षा करते हुए आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गया था। लेकिन प्राण छोड़ने से पहले उसने चार आतंकवादियों को जहन्नुम का रास्ता दिखा दिया था। शहीद का शव दो दिन बाद गांव खेड़ी पहुंचा था। जहां 13 नवंबर 1999 को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
स्कूल और सड़क के की घोषणा नहीं हुई पूरी
शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने आई वीरांगना रेशमा देवी ने बताया कि उस समय सरकार ने उनके पति के नाम पर कई घोषणाएं की थी। जिनमें खेड़ी के राजकीय स्कूल का नामकरण उनके नाम पर किया जाना था। साथ ही खेड़ी से कागदाना जाने वाली सड़क का नाम भी शहीद के नाम पर रखे जाने की घोषणा की थी, लेकिन एक भी घोषणा पर अमल नहीं हुआ। रेशमा देवी ने बताया की उस वक्त सरकार की घोषणा के अनुसार 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और पुत्र मुकेश को सरकारी नौकरी मिली है। लेकिन गैस एजेंसी व पेट्रोल पंप नहीं दिया गया है। उन्होंने अपने खर्चे से ही गांव में स्मारक बनाया व उसमें प्रतिमा स्थापित की है। हर बार सरकार व प्रशासन की तरफ से कोई नहीं आता। नेता व अधिकारी तो भूल सकते हैं पर हम कैसे भूल सकते हैं। राम कृष्ण खोथ का कहना है कि सरकार की तरफ से किसी के न आने से आखिर परायेपन का अहसास करा ही देती है। ऐसे में शहीदों का अपमान कब तक होता रहेगा।