सेवानिवृत्त हेड मास्टर महेन्द्र सिंह। अमर उजाला
मैंने जो सीखा, वह दूसरों के काम आए। इसीलिए सेवानिवृत्ति के बाद भी स्कूलों में जाकर बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहा हूं। अपने बच्चों पर ध्यान दिया। वे सफल बने। विद्यार्थी भी शिक्षक के लिए अपने बच्चे की तरह ही होते हैं। इन पर भी ध्यान दिया जाए तो ये भी सफल बन सकते हैं। इसी सोच के साथ खुद को आराम नहीं दिया है। यह कहना है कुलताना निवासी सेवानिवृत्त हेडमास्टर महेंद्र सिंह डबास का। शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने अपनी सोच साझा की।
उन्होंने कहा कि जीवन भर व्यक्ति कुछ न कुछ सीखता है। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरा सीखना व सिखाने का प्रयास जारी है। राजकीय कन्या उच्च विद्यालय बराहाना से 31 दिसंबर 2008 को सेवानिवृत्त होने के बाद अपना पठन-पाठन का अभियान जारी रखा है। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के मार्गदर्शन की आवश्यकता को समझते हुए यह फैसला लिया। पैर में चोट के बाद से स्कूटी के जरिये तीन विद्यालयों में जा रहा हूं। इसमें राजकीय कन्या उच्च विद्यार्थी बराहाना, राजकीय उच्च विद्यालय कुलताना की कक्षा नौवीं व दसवीं और राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बराहाना की 12वीं कक्षा शामिल है।
एमए, बीएड हैं पूर्व हेडमास्टर महेंद्र सिंह
कुलताना निवासी सेवानिवृत्त हेडमास्टर महेंद्र सिंह डबास राजनीति विज्ञान से एमए व बीएड पास हैं। शिक्षा जगत में 14 नवंबर 1972 को जेबीटी शिक्षक के रूप में कदम रखा। वे 29 दिसंबर 1997 को लेक्चरर पद पर पदोन्नत हुए। इसके बाद छह नवंबर 2006 को हेडमास्टर बने। इसके दो वर्ष बाद 31 दिसंबर 2008 को सेवानिवृत्त हो गए। पत्नी शकुंतला देवी राजकीय प्राथमिक पाठशाला कुलताना के मुख्य शिक्षक पद से सेवानिवृत्त हैं।
चारों बच्चे पढ़-लिखकर बने सफल
सेवानिवृत्त हेडमास्टर ने बताया कि उनके चार बच्चे हैं। बड़ी बेटी सरोज हेड मिस्ट्रेस है। उससे छोटी मनीषा सेना में मेजर व सबसे छोटी अंशुल मंत्रिमंडल सचिवालय में अधिकारी है। बेटा सुदीप फरीदाबाद में सह जिला न्यायवादी है। शिक्षा के बूते चारों बच्चे जीवन में सफल हुए। इसी तरह और बच्चे भी सफल बनें, इसलिए अपना शिक्षा अभियान चला रहा हूं।