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दर दर भटके किसान, फिर भी नहीं मिली खाद

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रेवाड़ी अनाज मंडी में सोमवार को खाद नहीं आने पर किसान भटकते दिखे। मंडी में एक प्राइवेट खाद केंद्? - फोटो : Rewari
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जिले के किसानों की खाद को लेकर मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही है। अब केवल सरसों की बिजाई के लिए किसानों के पास 6 दिन का समय बचा है। शहर की निजी एजेंसी के पास भी खाद खत्म होने से उनकी परेशानी दोगुनी हो गई है। सोमावर को किसान खाद के लिए दर-दर भटकते नजर आए।
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जिले में एक पखवाड़े से डीएपी खाद की किल्लत चौतरफा बनी हुई है। हर रोज सैकड़ों की तादाद में किसान खाद लेने के लिए सहकारी समिति कार्यालय व निजी खाद विक्रेताओं के पास पहुंच रहे हैं, लेकिन आधे लोगों को भी खाद नहीं मिल पा रही है। खाद नहीं मिलने के कारण किसान आक्रोशित है, क्योंकि सरसों की बिजाई में देरी हो रही है। सालोें बाद खाद को लेकर ऐसे हालात बने हुए हैं। पुलिस की पहरेदारी में खाद बेचना पड़ रहा है। जिले में पिछले शुक्रवार को डीएपी खाद समाप्त हो गई ती। उसके बाद केवल निजी केंद्रों पर ही खाद वितरित किया जा रही थी, लेकिन सोमवार को इन केंद्रों पर भी खाद खत्म हो गई। खाद के इंतजार में किसान घंटों तक खरीद केंद्रों के बाहर बैठे रहे, लेकिन उनको कही संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा था। किसान दिनभर खाद के लिए एक दुकान से दूसरी दुकान के चक्कर लगाते रहे।
मंगलवार को आएगा ढाई हजार मीट्रिक टन खाद
डीएपी भारत में कम बनती है। इसे दूसरे देशों से आयात करना पड़ता है। करीब 60 फीसदी डीएपी आयात होती है। इस बार कोरोना व कई अन्य कारणों के चलते डीएपी के आयात में परेशानी हुई है। जिले में अभी तक 12,395 मीट्रिक टन खाद आ चुकी है। मंगलवार को ढाई हजार मीट्रिक टन सरदार मार्का खाद की रैक खोरी यार्ड में पहुंचेगी। बुधवार तक निजी विक्रेताओं के पास खाद पहुंच जाएगी। इफ्को की खाद कब तक आएगी इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। जिले को कम से कम 21 हजार मीट्रिक टन डीएपी की आवश्यकता है। पिछले साल इस समय तक 18,116 मीट्रिक टन खाद मिल चुकी थी। करीब 6 हजार मीट्रिक टन खाद अभी तक जिे को कम मिली है । यानी 1 लाख 20 हजार बैग खाद पिछली बार इस समय तक अधिक आ चुके थे, जिससे किसानों को खाद मिलने में कोई परेशानी नहीं आई थी।
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डीएपी की जगह नैनो यूरिया का इस्तेमाल करें : आशीष पंवार
इफ्को के क्षेत्रीय अधिकारी ने बताया कि डीएपी का एक नहीं कई विकल्प हैं। किसानों को अपने परंपरागत ढंग छोड़ने होंगे। डीएपी का महज 30 फीसदी हिस्सा ही फसल के काम आता है, जबकि 70 फीसदी हिस्सा खेत में बगैर इस्तेमाल के ही पड़ा रहता है। ऐसे में जैव उर्वरक का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह जमीन में मौजूद फास्फोरस व नाइट्रोजन को खींचकर पौधों तक पहुंचाता है। बीजोपचार करके भी फसल की बिजाई की जा सकती है। इसके अतिरिक्त इफ्को का जल घुलनशील उर्वरक 1744 भी डीएपी से कहीं ज्यादा बेहतर है। इसके अतिरिक्त 1,91,919 व 0050 जल उर्वरक का इस्तेमाल किया जा सकता है। सरसों की बिजाई के 20 दिन बाद 1744 स्प्रे का एक बोतल नैनो यूरिया के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। यह डीएपी से कई गुना सस्ता है तथा इसमें 17 फीसदी नाइट्रोजन व 44 फीसदी फास्फोरस होता है। डीएपी जहां 30 फीसदी ही पौधे में इस्तेमाल होती है, वहीं जल उर्वरक 90 फीसदी तक फसल के काम आती है।

खाद के लिए केंद्र के बाहर बैठीं महिलाएं। संवाद- फोटो : Rewari

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