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गरमाई सियासत: पंजाब से डेपुटेशन पर भेजे गए 112 डॉक्टर चंडीगढ़ ने लौटाए, यूटी के अफसर बने हिस्सेदारी में रोड़ा

Thu, 03 Mar 2022 01:50 AM IST
पंचकुला ब्‍यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

चंडीगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में पंजाब और हरियाणा को अफसरों को 60:40 के अनुपात में तैनात किया जाता है, लेकिन यूटी के अफसर 60:40 अनुपात पर ही सवाल खड़े करते रहे हैं कि दोनों राज्यों की राजधानी घोषित किए जाते समय चंडीगढ़ में 60:40 की हिस्सेदारी का कोई लिखित प्रावधान नहीं है। यह सारी व्यवस्था जुबानी ही चलती रही है।
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यूटी सचिवालय। - फोटो : फाइल
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विस्तार
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पंजाब से डेपुटेशन पर भेजे गए 112 डॉक्टरों को यूटी चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा वापस भेज दिए जाने का मामला पंजाब की सियासत को गरमाने लगा है। यूटी प्रशासन के इस कदम को पंजाब की चंडीगढ़ पर दावेदारी को खत्म करने की साजिश के रूप में देखा जा रहा है। हाल के दिनों में यूटी के कई अन्य पदों पर पंजाब के अफसरों की तय नियुक्ति को दरकिनार करते हुए यूटी कॉडर, हरियाणा व हिमाचल और केंद्र सरकार के अधिकारियों को तैनात किए जाने के मामले भी सामने आए हैं।

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112 डॉक्टरों को वापस लौटाए जाने के मामले को शिरोमणि अकाली दल ने यूटी के अफसरों की उस साजिश का हिस्सा करार दिया है, जिसके तहत यूटी चंडीगढ़ के अधिकारी पंजाब के निर्धारित 60 फीसदी हिस्से को चरणबद्ध तरीके से घटाते हुए पंजाब की चंडीगढ़ पर दावेदारी को समाप्त कर देना चाहते हैं। दरअसल, राजधानी चंडीगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में पंजाब और हरियाणा को अफसरों को 60:40 के अनुपात में तैनात किया जाता है, लेकिन यूटी के अफसर 60:40 अनुपात पर ही सवाल खड़े करते रहे हैं कि दोनों राज्यों की राजधानी घोषित किए जाते समय चंडीगढ़ में 60:40 की हिस्सेदारी का कोई लिखित प्रावधान नहीं है। यह सारी व्यवस्था जुबानी ही चलती रही है।

खुद भी जिम्मेदार है पंजाब

दूसरी तरफ, चंडीगढ़ प्रशासन में पंजाब का घटते वर्चस्व के लिए स्वयं पंजाब भी जिम्मेदार दिखाई देता है। लंबे समय से पंजाब सरकार चंडीगढ़ में अपने हिस्से के विभिन्न पदों के लिए, बार-बार अफसरों के पैनल मांगे जाने के बावजूद अफसर भेजने में असमर्थता जताती रही है, जिसके परिणामस्वरूप पंजाब के हिस्से के पदों पर हरियाणा, हिमाचल और यूटी कॉडर के अधिकारियों को तैनात किए जाने का नया पैटर्न शुरू हो चुका है। 

पंजाब सरकार के ही पूर्व अधिकारियों का मानना है कि अब तक चंडीगढ़ में पंजाब का हिस्सा 60 से घटकर 4-5 फीसदी ही रह गया है। चंडीगढ़ में एसएसपी का पद पंजाब के हिस्से का है, लेकिन लंबे समय से राज्य सरकार इसके लिए पैनल ही तैयार नहीं कर पा रही। इसी तरह डीएसपी के पदों पर भी दानिक्स कॉडर के अफसरों को तैनात किया जा रहा है। पंजाब पुलिस हर बार स्टाफ कम होने की दुहाई देती रही है। चंडीगढ़ में ही पीआरओ का पद भरने के लिए यूटी प्रशासन ने 25 अप्रैल 2014 को पंजाब से तीन अधिकारियों का पैनल मांगा, जिस पर पंजाब ने असमर्थता जता दी। नतीजतन यह पद हरियाणा के अधिकारी से भरा गया। चंडीगढ़ ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (सीटीयू) में वर्कर्स मैनेजर का पद भरने के लिए भी पंजाब ट्रांसपोर्ट विभाग से पैनल मांगा गया, लेकिन हद तो तब हो गई जब ट्रांसपोर्ट विभाग ने यूटी प्रशासन को लिखित तौर पर कहा कि हमारे पास स्टाफ नहीं है और आप चाहें तो इस पद को अपने स्तर पर भर लें।

बीबीएमबी में खत्म होते प्रतिनिधित्व के कारण गरमाया मुद्दा

पंजाब के सभी राजनीतिक दल 1966 में सूबे के विभाजन के बाद से चंडीगढ़ पर पंजाब की दावेदारी जताते रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर कई विधानसभा चुनाव भी लड़े गए। इस दौरान आतंकवाद के दौर में भी एसवाईएल के साथ-साथ चंडीगढ़ मुख्य मुद्दा बना रहा, लेकिन कोई ठोस हल नहीं निकल सका। दूसरी तरफ, पंजाब के प्रशासनिक अधिकारी भी समय से साथ इस मुद्दे से दूर होते गए। हालात यहां तक पहुंचे कि चंडीगढ़ में पंजाब के अफसरों की नियुक्ति में भी कोताही बरती जाने लगी। कई मामलों में तो सूबे के अधिकारियों ने ही चंडीगढ़ में डेपुटेशन पर जाने से इनकार कर दिया। लंबे समय बाद बीबीएमबी में पंजाब का प्रतिनिधित्व खत्म होते देख प्रदेश सरकार और सियासी दल जाग गए हैं। इस तरह बीबीएमबी के साथ-साथ चंडीगढ़ पर दावेदारी भी चर्चा का मुद्दा बन गई है।

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