पंचकूला। शहर को विकल्प के तौर पर राजधानी के रूप में विकसित करने की योजनाओं पर काम हो रहा है, लेकिन अहिंसा और सत्याग्रह के मसीहा गांधी जी के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। यहां प्रदेश के अधिकतर विभागों के मुख्यालय हैं। यहां कई तरह के प्रदेश स्तरीय आंदोलन होते हैं। लेकिन, शांति से अपने हक के लिए लड़ने का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गांधी पंचकूला शहर में नजर ही नहीं आते हैं। उनके नाम पर एक चौक में बस एक चरखा रखा हुआ है।
उन्होंने आजादी का अलख जलाने के लिए जो मार्ग चुना वहां भी अब गांधी जी नहीं दिखते हैं। 100 साल पहले महात्मा गांधी पहली बार कालका से शिमला मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय के साथ 12 मई 1921 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रीडिंग से मिलने टॉय ट्रेन से गए थे। जिस मार्ग से राष्ट्रपिता आजादी की अलख जलाने निकले थे। आजादी के कई साल बाद उनकी याद में कालका में महात्मा गांधी चौक भी बनाया गया। चौक पर महात्मा गांधी की मूर्ति भी लगाई गई। लेकिन, यहां लगी मूर्ति कई सालों से गायब है। अब यहां पार्टियों के होर्डिंग और बोर्ड ही नजर जाते हैं।
बदहाल है महात्मा गांधी लाइब्रेरी
एडवोकेट विजय बंसल ने बताया कि कालका में महात्मा गांधी जी के नाम पर लाइब्रेरी है, लेकिन यहां बैठकर पढ़ने के लिए न तो प्रतियोगिताओं से जुड़ी किताबें हैं और ना ही फर्नीचर। यह लाइब्रेरी पहले नगर पालिका फिर नगर निगम, अब नगर परिषद के अधीन है, लेकिन लाइब्रेरी का रखरखाव पूरी तरह से नहीं होने के कारण बदहाल है।
चौक पर स्थापित होनी चाहिए प्रतिमा
कालका निवासी अजय सिंगला ने बताया कि 1921 में महात्मा गांधी कालका से शिमला गए थे, यहां उनके नाम पर चौक बनाया गया है। चौक पर उनकी प्रतिमा स्थापित होनी चाहिए। इसके अलावा उनके नाम पर बनाई गई लाइब्रेरी की सुविधाओं में इजाफा होना चाहिए। उसको जिला लाइब्रेरी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।