करनाल। बासमती धान की फसल में कुछ खेतों में कवक जनित रोग बकानी का प्रकोप नजर आ रहा है। यह रोग लाइलाज बताया जा रहा है। प्रभावित खेत में इसका असर यदि बढ़ता है तो उत्पादन शून्य की स्थिति तक पहुंचने की संभावना होती है।
यह रोग फसल लगाने की प्रक्रियाओं के दौरान असावधानियों की वजह से होता है। बताया जा रहा है कि बाद में किसी भी उपाय से इस पर नियंत्रण संभव नहीं है। जिले में धान के कुल 1.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पीआर ग्रुप धान 65 प्रतिशत व बासमती किस्मों का रकबा 35 प्रतिशत रहता है। प्रगतिशील किसान नबीपुर गांव निवासी कमल कांबोज ने बताया कि बासमती के कुल रकबे के दो से पांच प्रतिशत क्षेत्र में इसका असर है।
ये हैं लक्षण
प्रभावित पौधे अन्य पौधों की तुलना में अपेक्षाकृत बढ़ जाते हैं। बाद में सूख जाते हैं। यदि ये बालियां आने की स्थिति तक रहते हैं तो इन पर सफेद बालियां आती हैं। जिनमें दाने नहीं पड़ते।
बचाव की विधियां
- कार्बंडाजिम 50 प्रतिशत दवा दो ग्राम प्रति किलो से बीज उपचारित।
- नर्सरी उखाड़ने से एक सप्ताह पूर्व एक वर्ग मीटर नर्सरी में एक ग्राम कार्बंडाजिम दवा रेत में मिलाकर बुरकनी चाहिए।
- नर्सरी को पानी देकर उखाड़ना चाहिए ताकि जड़ों में घाव न हों।
यदि धान में बकानी रोग के लक्षण दिखाई दें तो कार्बंडाजिम दवा ढाई से तीन ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल मिलाकर छिड़काव करें। एक एकड़ में 500 ग्राम दवा पर्याप्त है। धान की नर्सरी में सूखे में पौध उखाड़ते समय जड़ों में घाव के कारण यह रोग आने की संभावना बनती है। जिन खेतों में प्रभावित पौधे दिखाई दे रहे हैं उन्हें उखाड़कर जमीन में दबा दें। रोग से ग्रस्त खेत में उत्पादन का प्रभावित होना इस बात पर निर्भर करता है कि किस हद तक बीमारी है।
- डा. सुरेश कुमार, सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी, कृषि विभाग करनाल