लाल चंद गौदारा ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि उन्होंने 1962, 65 और 71 की लड़ाई में सैनिक के रूप में काम करके दुश्मन के छक्के छुड़ाए। 1972 से लेकर 2002 तक परिवहन विभाग में यार्ड मास्टर के रूप में सेवाएं दीं। नौकरी पूरी करने के बाद उन्होंने हैमर और डिसकस थ्रो खेलना शुरू किया तो अब तक 40 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। रोजाना 11 किलोमीटर की दौड़ लगाकर खुद में 81 की उम्र में 18 जैसा जोश बनाए हुए हैं। उनका कहना है कि आलसी को न कभी विद्या मिलती है न ही आराम। इसलिए जिस उम्र में लोग आराम करते हैं, उस आयु में पढ़ रहे हैं।
चंडीगढ़ की रूपा ने बताया कि उनके पति प्रवीण कुमार लीवर की दिक्कत के कारण 12 साल तक बेड पर रहे। उन्होंने अपना लीवर डोनेट किया तो जिंदगी बची। ऑर्गन डोनेशन की वैल्यू समझते हैं, इसके लिए तैयार होने के लिए काउंसलिंग की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि पति के इलाज के लिए कई जगह चक्कर काटने पर भी रास्ता नहीं मिला। ऐसा किसी अन्य के साथ न हो, जानकारी के अभाव में कोई जान न गंवाए, इसलिए उन्होंने एमएसडब्ल्यूसी की डिग्री लेने की ठानी। यह डिग्री लीवर मरीजों को समर्पित करते हुए उन्होंने जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया है।