202: एनडीआरआई के निर्देशक डा एमएस चौहान।
करनाल। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई-नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट) करनाल के निदेशक डा. मनमोहन सिंह चौहान को भारतीय विज्ञान अकादमी की फेलोशिप मिली है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कृषि अनुसंधान क्षेत्र में 1935 से अब तक केवल दस वैज्ञानिकों को यह स्थान प्राप्त हुआ है। संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी डा. एके डांग ने बताया कि एनडीआरआई से डा. चौहान पहले वैज्ञानिक हैं जिन्हें इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।
उन्होंने बताया कि यह पुरस्कार पांच अक्तूूबर को नई दिल्ली में आयोजित अकादमी की वार्षिक आम बैठक में घोषित किया गया था। यह फेलोशिप भारत में वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जिसमें राष्ट्रीय कल्याण की समस्याओं के व्यावहारिक अनुप्रयोग भी शामिल हैं। डा. चौहान नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के फेलो, नेशनल एकेडमी ऑफ डेयरी साइंसेज के फेलो व सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन के फेलो हैं।
डा. चौहान आईसीएआर की ओर से रफी अहमद किदवई पुरस्कार 2015 से भी नवाजे जा चुके हैं। एनएएएस द्वारा डा. पी. भट्टाचार्य मेमोरियल अवार्ड 2020, आईएआरआई द्वारा राव बहादुर बी विश्वनाथ पुरस्कार 2019, कृषि विज्ञान में वासविक औद्योगिक पुरस्कार 2015, पशु विज्ञान में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-टीम पुरस्कार 2014, आईएसएसआरएफ द्वारा डा. लाभसेटवार पुरस्कार-2016, डीबीटी बायोटेक्नोलॉजी ओवरसीज फेलोशिप अवार्ड 1997, वर्जीनिया टेक यूएसए द्वारा डेयरी साइंस में अनुकरणीय अनुसंधान पुरस्कार 1999 तथा 2009 में जर्मनी का दौरा करने वाले वैज्ञानिक, 2009 में यूरोपीय इरास्मस मुंडस छात्रवृत्ति पुरस्कार और 2021 में एनएएएस अकादमी के कार्यकारी परिषद सदस्य के रूप में सम्मान मिला है।
डा. मनमोहन सिंह चौहान ने भ्रूण स्टेम सेल प्रौद्योगिकी जैसी सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पांच भ्रूण भैंस स्टेम सेल लाइनों और दो शुक्राणुजन स्टेम सेल लाइनों का उत्पादन किया है। ओवम पिक अप-आईवीएफ तकनीक मवेशियों और याक में, भारत का पहला ओपीयू-आईवीएफ साहिवाल बछड़ा ‘होली’, ओपीयू-आईवीएफ याक बछड़ा ‘नोर्गयाल’ और उनके मार्गदर्शन में 17 क्लोन भैंसों को भी विकसित किया गया है। उपरोक्त कई तकनीकों को क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया है।