कलायत। वैशाख पूर्णिमा पर शुक्रवार को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगेगा। यह चंद्र ग्रहण उपछाया चंद्र ग्रहण होगा, जिसमें चंद्रमा का कोई भाग कटा हुआ नजर नजर नहीं आएगा। हालांकि चांद में धुंधलापन दिखाई देगा। 15 दिनों के अंतराल में ये इस साल का दूसरा ग्रहण है। इससे पूर्व 20 अप्रैल को पहला सूर्य ग्रहण लगा था।
इस संबंध में पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि साल का पहला चंद्रग्रहण बुद्ध पूर्णिमा के दिन यानी पांच मई को लगने जा रहा है। चंद्रग्रहण को वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टि से अहम माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से जब सूर्य और धरती के बीच चंद्रमा आ जाता है तो चंद्रग्रहण लगता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रग्रहण के दौरान राहु चंद्रमा को ग्रसित कर देते हैं। पांच मई को लगने जा रहा चंद्रग्रहण उपछाया चंद्रग्रहण रहेगा।
उन्होंने बताया कि जब ग्रहण लगता है तो चंद्रमा पृथ्वी की उपछाया में प्रवेश करती है जिसे चन्द्र मालिन्य कहते हैं। इसके बाद चांद पृथ्वी की असली छाया में प्रवेश करता है। जब ऐसा होता है तो तब वास्तविक ग्रहण होता है। लेकिन कई बार चंद्रमा उपछाया में प्रवेश करके उपछाया शंकु से ही बाहर निकल जाता है और पृथ्वी की वास्तविक छाया में प्रवेश नहीं करता है। इसलिए उपछाया चंद्रग्रहण में चंद्रमा का बिंब बस धुंधला पड़ता है और पूरी तरह से काला नहीं होता है। उपछाया चंद्रग्रहण में सूतक का विचार नहीं किया जाता।
शांडिल्य ने बताया की चंद्रग्रहण पांच मई को रात 8 बजकर 44 मिनट से आरंभ होगा और इसका समापन देर रात एक बजकर 02 मिनट पर होगा। चंद्र ग्रहण की कुल अवधि 4 घंटे 15 मिनट की होगी। चंद्र ग्रहण का परमग्रास समय रात 10 बजकर 53 मिनट पर है। ये उपछाया चंद्र ग्रहण तुला राशि और स्वाति नक्षत्र में लगेगा।
पूर्णिमा पर ही क्यों लगता है ग्रहण
चंद्र ग्रहण विज्ञान के अनुसार सूर्य ग्रहण ज्यादातर अमावस्या पर और चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन लगता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब भी चंद्रमा पृथ्वी की छाया में आता है वह पूर्णिमा का दिन ही होता है। पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण लगने का कारण है सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में होना होता है। यह सिर्फ ज्यामितीय प्रतिबंध के कारण ही हो सकता है।