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देस पै जान निछावर कर कै चले गए, शहीद मरे नहीं बेशक मर कै चले गए..

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Des Pai sacrificed his life and went away, the martyr did not die, of course, he died.. - फोटो : Kaithal
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कैथल। साहित्य सभा की मासिक काव्य गोष्ठी रविवार को आरकेएसडी कॉलेज में हुई। गोष्ठी के आरंभ में सीडीएस बिपिन रावत व अन्य अधिकारियों को नम आंखों से दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में साहित्यकार डॉ. हरीश झंडई शामिल रहे, जबकि अध्यक्षता प्रो. अमृतलाल मदान ने की।
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गोष्ठी की शुरुआत करते हुए डॉक्टर प्रद्युम्न भल्ला ने कहा कि जिन्हें आपकी रहनुमाई मिली, वही जिंदगी, जिंदगी हो गई। सतीश वर्मा माजरा ने कहा कि मैदान-ए-जंग में हूं दुश्मन से निपट कर आऊंगा, घर लौट के आया तो तिरंगे में लिपट कर आऊंगा। साहित्यकार अनिल कौशिक ने कहा कि भविष्य सुखद लौटे वह लिए चेहरे पर लाली, चंदा को चांदनी मिल गई, छठी अमावस काली। रिसाल जांगड़ा ने हरियाणवी भाषा में कहा कि देस पै जान निछावर कर कै चले गए, शहीद मरे नहीं बेशक मर कै चले गए। चतुर्भुज बंसल ने कहा कि वैध, हकीम, डॉक्टर भी, चाहे जितना जोर लगा ले, जिसकी फूट तै टूट गई, उसने कौण बचा ले। महेंद्र पाल सारस्वत पाई ने कहा कि जिनको सच्चा प्रेम वतन का ख्याल है, वही भारत मां के असली लाल हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ने अपनी रचना पेश करते हुए कहा कि कैसी है कुदरत की अनहोनी घटना, चली गई है वतन की खुशबू। इसी प्रकार अमृतलाल मदान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि चाह रही बिछ जाऊं मैं भी, वीरों के उस पथ पर जाकर, जीवंत जनरल चला जहां, पग-पग अंतिम यात्रा पर। गोष्ठी में कमलेश शर्मा, ओमपति मोर, डॉ. ओपी सैनी व अशोक अत्री ने भी अपने विचार रखे।
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