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महंगाई की मार से तंगहाली में 'माटीपुत्र'

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मिट्टी के दीयों को लाल रंग में रंगते कुम्हार चंद्रभान - फोटो : Hisar
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हिसार। मिट्टी के दीपक बनाकर दिवाली में उजाले का रंग भरने वाले कुम्हार कारीगरों की आर्थिक स्थिति महंगाई के कारण तंगहाल है। वहीं चाइनीज सामान की बढ़ती मांग ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है। पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के कारण जहां घरेलू उपयोगी वस्तुएं महंगी हो गई हैं। वहीं, मिट्टी के दीयों की कीमत तो नहीं बढ़ पाई लेकिन उनकी लागत का खर्च बढ़ गया है।
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मेहनत से मिट्टी को आकार देते कुम्हारों का कहना है कि पहले जहां प्रति ट्रैक्टर मिट्टी की कीमत 1500 से 1800 थी वह बढ़कर 2500 रुपये हो गई है। मिट्टी लाने वालों की मजदूरी 500 रुपये से 700 रुपये प्रति ट्रॉली हो गई है। महंगाई की मार का असर लकड़ी के बुरादे व उपले पर भी पड़ा है। पहले जो बुरादा डेढ़ रुपये में मिलता था आज उसकी कीमत ढाई रुपये है और दो रुपये का उपला अब तीन रुपये में मिल रहा है। हालांकि चाइनीज लाइट के जमाने में भी लोगों में मिट्टी के दीये का क्रेज बढ़ता जा रहा है। लोगों को इस परंपरा से जोड़े रखने के लिए कुम्हारों ने इस बार 3 महीने पहले से ही दीये बनाना शुरू कर दिया था। प्रति एक कुम्हार का परिवार करीबन 60 से 70 हजार दीये दिवाली पर बनाता है।
रोशनी के पीछे छिपी है घंटों की मेहनत
कुछ समय में हुई बारिश के कारण कुम्हार मिट्टी नहीं ला पा रहे थे, लेकिन दिवाली पर घरों में रोशनी देने, परंपराओं व संस्कृति को बरकरार रखने के लिए कुम्हारों ने गांव न्यूली कलां से मिट्टी लाने के लिए करीबन 1 महीने का इंतजार किया। दीये बनने में जितनी मेहनत व लागत लगती है उतने इनके दाम नहीं मिल रहे हैं। दीये बनाने के लिए मिट्टी लाकर उसे सुखाया जाता है, फिर गिला कर उसे स्मूथ किया जाता है। उसके बाद उसे टाइट किया जाता है। फिर मिट्टी को चाट पर चढ़ा दिया जाता है। इस तरह से मिट्टी को सूखने व टाइट होने में दो से तीन दिन का समय व चाट पर गर्म होकर उतारने में करीब 12 घंटे का समय लगता है।
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हमें सरकार से जैसी मदद मिलनी चाहिए वैसी नहीं मिल पा रही। हम चाहते हैे कि सरकार हमें मिट्टी मुहैया कराए। अब हम शहर के बीच आ गए हैं तो भट्टी, धुएं से यहां रहने वाले अन्य लोगों को भी परेशानी हो रही है जिसके लिए सरकार को इलेक्ट्रोनिक भट्टी उपलब्ध करवानी चाहिए। - अमरनाथ
यह काम हम पिछली तीन पीढ़ियों से करते आ रहे हैं, लेकिन अब मेरे बेटे हमारे इस व्यावसायिक को आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं क्योंकि इस काम में मेहनत व लागत जितनी अधिक होती है कि मुनाफा नहीं कमा पा रहे हैं। - सुरेश
अपील : परंपरागत व्यवसाय को चलाओ, दिवाली खुशहाल बनाओ
आओ इस दिवाली हम सब मिलकर मिट्टी के दीये जलाएं मिलकर इनके व्यवसाय को बढ़ाएं। इन्हें रोजगार देकर इनकी जिंदगी को भी रंगीन बनाएं। आओ चाइनीज छोड़, हम स्वदेशी अपनाएं।
रंग बिरंगे दीयों से सजा बाजार
दीपावली के उपलक्ष्य में रंग-बिरंगे दीयों से बाजार सज चुके हैं। दीयों की बाजार में ढेरो वैरायटी उपलब्ध है। इस दीयों पर खासतौर पर गुलाबी रंग कर डिजाइन को उकेरा गया है। इस बार लोग मिट्टी की दिवाली (हट्डी) को खरीद रहे हैं जिसकी कीमत 80 से 100 रुपये है।

लक्ष्मी -गणेश की मूर्ति वाला रंगीन दीया- फोटो : Hisar

कुम्हारों ने बनाए दीये। - फोटो : Hisar

गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा वाले दीये- फोटो : Hisar

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