पापा की कमी अखरती है
पापा ने गांव वालों को जवाब देना शुरू कर दिया और कहा कि मैं नहीं मानता कि यह मेरी बेटी है। मैं तो यह मानता हूं मेरा बेटा है। पापा ने काफी सपोर्ट किया। गांव में अच्छी सुविधा न होने पर उन्होंने बाहर कोचिंग लेने के लिए पापा से बात की। लेकिन, घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते पापा ने मना कर दिया था। हालांकि कुछ समय बाद पापा ने उन्हें रोहतक ट्रेनिंग करने के लिए भेजा। 2016 से किरण रोहतक के राजीव गांधी स्टेडियम में प्रैक्टिस कर रही हैं। 2018 से उन्होंने मेडल जीतने शुरू कर दिए थे। इसी बीच 2022 में पापा की मृत्यु हो गई थी तो थोड़ी मुश्किल हुई, लेकिन मैंने अपने प्रयास जारी रखे। लेकिन, पापा की कमी अखरती थी, क्योंकि मुझे उनका काफी सपोर्ट मिलता था। आज अगर पापा को पता चलता कि उनकी बेटी ओलंपिक में खेलेगी तो वह बेहद खुश होते।
कभी भी ट्रेनिंग नहीं छोड़ी
किरण पहल ने बताया कि वह सुबह छह बजे से साढ़े आठ बजे तक और शाम को पांच बजे से साढ़े सात बजे तक मैदान में प्रैक्टिस करती थी। उन्होंने प्रैक्टिस को कभी नहीं छोड़ा। अगर प्रैक्टिस को छोड़ देती तो घरवाले घर के कामों में लगा देते। इसलिए वह रेगुलर प्रैक्टिस करती थी।
कोच ने किया पूरा सपोर्ट
किरण पहल रोहतक के राजीव गांधी स्टेडियम के कोच आशीष चिकारा के साथ 2016 से ट्रेनिंग कर रही हैं। कभी-कभी आर्थिक हालात ऐसे बिगड़े कि गेम छोड़ने का मन करता था। लेकिन, कोच ने कहा कि अगर गेम छोड़ना है तो कुछ अच्छा करके छोड़ना। कोच ने जूतों से लेकर ट्रेनिंग तक पूरा सपोर्ट किया। मैने इस चैंपियनशिप को जिंदगी की आखिरी चैंपियनशिप समझकर खेला था। आखिरकार में 400 मीटर में स्वर्णपदक जीतने के साथ ओलंपिंग का टिकट पाने में कामयाब रही।