ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक हजरत सैयद सालार मसूद गाजी मियां अलैहिर्रहमां दीन-ए-इस्लाम को चौथे खलीफा हजरत अली रजियल्लाहु अन्हु की बारहवीं पुश्त से है। गाजी मियां के वालिद का नाम गाजी सैयद साहू सालार था। आप सुल्तान महमूद गजनवीं की फौज में कमांडर थे। सुल्तान ने साहू सालार के फौजी कारनामों को देख कर अपनी बहन सितर-ए-मोअल्ला का निकाह आप से कर दिया।
जिस वक्त सैयद साहू सालार अजमेर में एक किले को घेरे हुए थे, उसी वक्त गाजी मियां 15 फरवरी 1015 ई. को पैदा हुए। चार साल चार माह की उम्र में आपकी बिस्मिल्लाह ख्वानी हुई। नौ साल की उम्र तक फिक्ह व तसव्वुफ की शिक्षा हासिल की। आप बहुत बड़े आलिम थे। आप बहुत बहादुर थे। आपकी शहादत असर व मगरिब के बीच इस्लामी तारीख 14 रजब 423 हिजरी में (बहुत ही कम उम्र में) हुई।
आप हमेशा इंसानों को एक नजर से देखते थे। सभी से भलाई करते। दुनिया से जाने के बाद भी आपका फैज जारी है। आपका मजार शरीफ बहराइच शरीफ में है। अकीदतमंदों ने गोरखपुर में सैकड़ो साल पहले प्रतीकात्मक मजार बनाई। जो वक्फ विभाग में दर्ज है। गाजी मियां के नाम से मोहल्ला गाजी रौजा भी बसा है।
भारतीय आजादी के अगुवा महात्मा गांधी 1921 में गोरखपुर आए। शहर के पश्चिमी छोर पर राप्ती नदी के बंधे के किनारे बसे मोहल्ला बहरामपुर बाले के मैदान में गांधीजी ने जोरदार भाषण दिया था। वह समय खिलाफत आंदोलन व असहयोग आंदोलन का चल रहा था।