ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में रात में देवी की निशा पूजन व जागरण पूरे विधि-विधान से संपन्न होता था और अगले दिन सुबह रात में बने बासी प्रसाद को ग्रहण करते थे। बासी प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा आज भी चली आ रही है। हालांकि एक और मान्यता के अनुसार यहां प्राचीन काल में एक बस्ती थी।
बस्ती के बसने के नाम पर इसे बसिया नाम मिला और बस्ती में पुराने घरों के होने की वजह से कालांतर में इसमें डीह शब्द जुड़ गया। यह बस्ती बाद में राप्ती-रोहिन नदी के प्रवाह में विलीन हो गई लेकिन यहां की कुलदेवी का स्थान बच गया, जिसकी मान्यता आज सिद्ध स्थल के रूप में है।
पूरे साल होते हैं मांगलिक कार्य
बसिया डीह में स्थापित माता के स्वरूप को लोग मां दुर्गा का अवतार मानकर आराधना करते हैं। मंदिर परिसर में मांगलिक कार्यों का सिलसिला वर्ष भर चलता रहता है। नवरात्र के दौरान इस मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगती है। वहीं सावन के अंतिम दिन यहां बड़े मेले का आयोजन होता है जिसके बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। मान्यता यह है कि यहां मानी गई मनौती जरूर पूरी होती है।