उरुवा की रूबी सिंह बताती हैं कि उन्हें एम्स में कान के ऑपरेशन के लिए तीन साल बाद का समय दिया गया था, लेकिन अब एम्स से फोन आया और बुलाया गया है। हालांकि, इस बीच वह बाहर दिखा चुकी है, इस वजह से अभी अभिभावक निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि ऑपरेशन कहां पर कराया जाए।
मरीजों को मिलाया फोन तो सामने आई सच्चाई
पूरा खेल लंबे समय से सेटिंग पर चल रहा है, लेकिन अमर उजाला ने मामले को जब प्रमुखता से उठाया तो एम्स प्रशासन ने इसकी सुधि ली। मरीजों के पास फोन करके जिम्मेदारों ने जानकारी हासिल की तो पूरी सच्चाई सामने आ गई।
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पता चला कि डॉक्टर बाहर की दवा लिखते हैं तो वहीं सिकरीगंज के शुक्लपुर निवासी अशोक शुक्ला के भाई संतोष ने एम्स प्रशासन को यहां तक बताया कि किसका नंबर उन्हें दिया गया था और फिर वहां से इंप्लांट खरीदने के बाद एम्स प्रशासन ने परिसर में जेनरिक दवाओं भी ऑपरेशन नहीं किया गया। मजबूर होकर उन्हें नर्सिंग होम में जाना पड़ा। सस्ते इलाज की आस में आए संतोष को भाई के कूल्हा के ऑपरेशन के लिए 45 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ा।
मीडिया प्रभारी एम्स पंकज श्रीवास्तव ने कहा कि मरीजों की सहूलियत के लिए इंप्लांट की रसीद की जांच सहित कई आदेश दिए गए हैं। मरीजों को किसी तरह से ठगा न जाए, इसकी कोशिश की जा रही है।