दवाओं के धंधेबाजों पर कार्रवाई नहीं होने की असल वजह सरकारी तंत्र की सुस्ती है। अगर आंकड़ों की बात करें तो जिले में इस साल जनवरी से अब तक 136 दवाओं के सैंपल लिए गए, लेकिन रिपोर्ट सिर्फ 75 की आई। जिला अस्पताल गेट के सामने की चार दुकानों से जो सैंपल लिए गए, उनकी भी रिपोर्ट अब तक नहीं मिली। जिन 75 दुकानों की रिपोर्ट आई, उनमें से केवल दो सैंपल ही मानक से कम पाए गए।
अब इसकी रिपोर्ट शासन को गई है, जिसके बाद संबंधित दवाओं के निर्माताओं को पत्र भेजा जाएगा। पिछले साल भी दो दुकानों की दवा का सैंपल मानक के अनुरूप नहीं मिला था। लेकिन रिपोर्ट को ही कंपनियों ने चैलेंज कर दिया, जिसके बाद दोनों सैंपल अब जांच के लिए कोलकाता भेजे गए हैं। इस तरह देखें तो दो साल में एक भी धंधेबाज पर कार्रवाई नहीं हो पाई।
इसे भी पढ़ें: शादी का झांसा देकर दुष्कर्म, अब जान से मारने की दे रहा धमकी
यह हो सकता है नुकसान
एमडी मेडिसिन डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि एक्सपायरी डेट का मतलब है कि दवा में मौजूद साल्ट की क्षमता उस तिथि तक समाप्त हो जाएगी। इसलिए ऐसी दवाएं एक्सपायरी डेट के बाद बेअसर हो जाती हैं। कुछ दवाएं ऐसी होती हैं, जिनके एक्सपायर होने के बाद उपयोग पर शरीर में प्रतिरोध होने के चलते एलर्जी के लक्षण दिखते हैं। मरीजों को सीधा नुकसान यह होता है कि अगर वे एक्सपायर हो चुकी दवा का उपयोग कर रहे हैं, तो उनका रोग ठीक नहीं होगा।
इसे भी पढ़ें: गोरखपुर का टॉप माफिया: चप्पल की दुकान से बन बैठा मैरिज हाउस का मालिक, रसूख भी बनाया
ड्रग इंस्पेक्टर जय कुमार सिंह ने कहा कि जो भी सैंपल भेजे जाते हैं, उनकी जांच में ढाई से तीन महीने का वक्त लगता है। जिला अस्पताल के सामने की दुकानों से जो सैंपल लिए गए थे, उनकी रिपोर्ट अभी नहीं आई है। एक नर्सिंग होम व एक अन्य दुकान के सैंपल की रिपोर्ट आई है, जिसमें दवा की गुणवत्ता का स्तर मानक से कम पाया गया है। इसकी जांच कर दवा निर्माता कंपनी को नोटिस भेजा जाएगा। पिछले साल के दो सैंपल की रिपोर्ट पर संबंधित कंपनियों की तरफ से आपत्ति जताई गई है, जिसके बाद सैंपल को दोबारा जांच के लिए कोलकाता भेजा गया है।