चौधरी ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ से 2006 से सेवानिवृत्त होने के बाद जब वह भारत आए तो सबसे पहले उन्होंने पीआरडीएफ संस्था का रजिस्ट्रेशन कराया। उसके बाद काला नमक धान पर पूर्णकालिक कार्य शुरू किया। सबसे पहले पूर्वांचल के विभिन्न गांवों से 2500 नमूने किसानों से एकत्र किए। अनुसंधान के लिए सभी नमूनों को अलग-अलग खेत में दो से तीन लाइन में रोपा गया। धान की कटाई के बाद सभी धानों का अलग-अलग सुगंध था।
उन्होंने बताया कि सभी की बालियों के निकलने का समय भी अलग था। एक धान का नमूना अच्छा लगा। उसका नाम दिया एन-3 और खलीलाबाद अनुसंधान केंद्र पर रिसर्च कर उसका बीज पैदा किया गया। अगले साल बुवाई के लिए किसानों को दिया गया। जब किसानों ने रोपाई की तो पहले जैसी सुगंध थी। लेकिन पैदावार एक एकड़ में 10 क्विंटल से कम था। डंठल बड़ा होने से वह गिर जा रहा है।
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डॉ. चौधरी ने बताया कि रिसर्च कर काला नमक की बावनी प्रजाति-101 को विकसित किया। उसे किसानों को दिया गया, उत्पादन तो बढ़ा पर किसान कहने लगे कि इसका रंग भूरा है। फिर नया रिसर्च किया और नई प्रजाति तैयार की। उसे नाम दिया गया काला नमक-102 और इसका रिस्पांस बहुत बेहतर मिला। सैकड़ों किसानों को उसका बीज देकर उनकी राय जानी।
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किसानों ने कहा कि सब ठीक है। लेकिन जब राइस मिल में धान गया तो टूटन ज्यादा निकला। उसके बाद नई प्रजाति किरन विकसित की गई और नाम दिया गया किरन कालानमक-बावनी। इस समय यह काला नमक की सबसे बेहतर प्रजाति है। इसमें सुगंध बहुत बढि़या और चावल मुलायम होता है। एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन 50 क्विंटल हो रहा है।