घटना के वक्त वे दोनों चौरीचौरा के ब्रह्मपुर ब्लाॅक से आ रहे थे। आरोप रामभवन यादव और उसके परिवार पर था। रामसकल के घर के लालमोहन यादव और उनके साथी पिता और चाचा के शव के पास नहीं गए। वे गांव में आ गए और तांडव मचाना शुरू कर दिए। दो नाली बंदूक गरजना शुरू कर दी।
रामभवन के तरफ का जो जहां मिला वहीं उसे मौत के घाट उतार दिया गया। दोनों पक्ष से उसी दिन आठ लोगों की जानें चली गईं। घटना के बाद गांव में चारों तरफ खौफ था। इस घटना से उबरने में गांव के लोगों को सालों लग गए। हालांकि वर्तमान में गांव पूरी तरह शांत है। लोग अपने रोजमर्रा के जीवन में व्यस्त हैं। लेकिन घटना का जिक्र आते ही वे सहम जाते हैं और चर्चा से भी इन्कार कर देते हैं।
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घटना नौ अगस्त 2012 में खजनी इलाके के जैतपुर में हुई थी। जैतपुर का नाम आते ही लोगों के जेहन में तीन हत्याओं की घटना आ ही जाती है। यहां पूर्वांचल का सबसे बड़ा पशु बाजार लगता था। इस बाजार की शुरुआत 90 के दशक से हो गई थी। उसी समय विवाद ने भी जन्म ले लिया था। वजह यह थी कि दोनों पक्ष के पास अलग-अलग बाजारों का ठेका था।
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घटना वाले दिन जैतपुर में साप्ताहिक बाजार लोगों और पशुओं से खचाखच भरा था। दूर-दूर से व्यापारी और खरीदार पहुंचे थे। सबकुछ सामान्य था 3:30 बज चुके थे। अब धीरे-धीरे बाजार खत्म हो रहा था। बाजार लगवाने वाले अमटौरा गांव निवासी राणा सिंह का विवाद बाजार के रंजीत पांडेय से हो गया। वजह ये थी कि बाजार में गोवंशों को वाहनों पर चढ़ाने के लिए मिट्टी गिराकर ऊंचा किया गया था, जिसका अलग-अलग व्यापारियों से शुल्क लिया जाता था।
उस वक्त भी एक व्यापारी वाहन पर गोवंशों को चढ़ा रहा था, तभी एक गोवंश भागकर रंजीत के घर के सामने पहुंच गया। जिस पर रंजीत पक्ष ने व्यापारी को थप्पड़ जड़ दिया। इसकी जानकारी होने पर राणा पक्ष वहां पहुंचा और दोनों में झगड़ा शुरू हो गया। फिर रंजीत पांडेय और उनके दो बेटों की हत्या कर दी गई थी।