सूत्र बताते हैं कि जिला अस्पताल के सामने की दुकानों में लस्सी की एक दुकान पर ही कमीशन का रजिस्टर बनाया गया था। वहां पर शाम में आसपास के दुकानदार भी हिसाब देते थे कि कितना किस डॉक्टर के पर्चे पर दवा बिकी है और फिर उसका हिसाब-किताब होता है। वहीं एक दुकान ऐसी भी है जहां शाम ढलते डॉक्टर भी पहुंच जाते थे, वहां अब कोई नजर नहीं आ रहा है। यह वहीं दुकान है, जहां से लोकल दवाओं की जरूरत होने पर खरीदारी भी की जाती है।
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दरअसल, मरीज माफिया को लेकर डीएम कृष्णा करुणेश ने सीएमओ और एसआईसी से बातचीत कर नाराजगी जाहिर की है। इसके बाद से ही सभी को लगने लगा है कि अब यह खेल आसान नहीं है। लेकिन अभी यह देखना होगा कि यह सख्ती कितने दिनों तक बनी रहती है।
स्पेशल वार्ड की आड़ में आते हैं प्राइवेट पैथोलॉजी कर्मी
जिला अस्पताल में स्पेशल व प्राइवेट वार्ड भी है। यहां पर भर्ती होने पर मरीज को न्यूनतम शुल्क देने का नियम है। दूसरे यहां की दवाओं की खरीद और जांच भी बाहर से होती है। इसी की आड़ में प्राइवेट पैथोलॉजी वालों का दखल अस्पताल में होता है। यहां पर तो वे नियम-कानून से काम करते हैं, लेकिन फिर सेटिंग की मदद से उस वार्ड तक पहुंच जाते हैं, जहां दवा और जांच निशुल्क है, लेकिन अब इस पर सख्ती कर दी गई है।