गोरखपुर के धुरियापार में एथेनॉल प्लांट का निर्माण 800 करोड़ रुपये से कराया जा रहा है। गन्ना, पराली व गोबर से एथेनॉल बनाया जाना है। यह परियोजना भी किसानों के लिए सौगात लेकर आएगी। आय बढ़ाने में मददगार साबित होगी। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार बढ़ जाएगा।
सहजनवां के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट की क्षमता बढ़ाई जा रही है क्या?
गोरखपुर में एलपीजी का सबसे खास बॉटलिंग प्लांट बना है। इसकी क्षमता 48 प्वाइंट 2 कैरोजल है। यह दो प्लांट के बराबर है। प्रति मिनट में 96 गैस सिलिंडर भरे जा सकते हैं। रोजाना 28 हजार गैस सिलिंडर भरने की क्षमता है, लेकिन इस वक्त 35 हजार सिलिंडर भरे जा रहे हैं। एक शिफ्ट में रोजाना 40-45 हजार गैस सिलिंडर की आपूर्ति का लक्ष्य है। अगर दो शिफ्ट में काम किया जाए तो रोजाना 70 हजार गैस सिलिंडर भरे जा सकते हैं।
कंपोजिट सिलिंडर की क्या खासियत है, किस तरह से सुरक्षित है?
यह सिलिंडर पारदर्शी व फाइबर युक्त है। स्टील सिलिंडर से 50 फीसदी हल्का है। जंग नहीं लगेगा। ब्लास्ट प्रूफ है। विस्फोट की गुंजाइश नहीं रहेगी। पारदर्शी होने की वजह से गैस की मात्रा का आसानी से पता चल सकेगा। कंपोजिट सिलिंडर पांच व दस किलोग्राम में आता है। एलपीजी गैस की कीमत एक जैसी है। कंपोजिट सिलिंडर की रिफंडेबल सिक्योरिटी कुछ ज्यादा जमा कराई जाती है। हालांकि यह धनराशि सुरक्षित रहती है। जब चाहे, उपभोक्ता इसे वापस ले सकते हैं। गोरखपुर में 25 से ज्यादा उपभोक्ता विश्वस्तरीय नई तकनीकी व मेक इन इंडिया का कंपोजिट सिलिंडर इस्तेमाल कर रहे हैं। जिन उपभोक्ताओं के पास सामान्य सिलिंडर है, वह बदलकर कंपोजिट सिलिंडर ले सकते हैं। गैस भराने के बाद दस किलोग्राम का सिलिंडर 660 रुपये में मिलेगा।
बिल्कुल। कंप्रेस्ड बायोगैस व एथेनॉल प्लांट का निर्माण इसी दिशा में उठाया गया कदम है। बैतालपुर टर्मिनल में वेपर रिकवरी सिस्टम (वीआरएस) लगाया गया है। यह हवा में घुलने वाले वेपर को सोख लेगा, फिर पाइप के जरिए टैंकर तक भेजेगा। पंपों पर भी वीआरएस लगवाए जा रहे हैं। जो टैंकर अभी तक ऊपर से भरे जाते थे, उसे टैंकर के निचले हिस्से से भरने की व्यवस्था बनाई जा रही है। इससे भी पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सकेगा। डीजल-पेट्रोल की गुणवत्ता बढ़ाकर कार्बन मोनो ऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा कम की जा रही है।
सहजनवां बॉटलिंग प्लांट में बाढ़ का पानी घुस गया था, किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा था?
नुकसान का न पूछिए। यह सोचिए कि आईओसीएल फैमिली ने कठिन चुनौती के बीच कितनी दृढ़ इच्छा शक्ति व ईमानदारी से काम किया। एक सितंबर को प्लांट में बाढ़ का पानी घुसा था। 15 सितंबर तक प्लांट बंद रहा। ऐसे में गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बलिया और मऊ में पर्याप्त गैस सिलिंडर आपूर्ति की चुनौती थी। उपभोक्ता सुविधा को ध्यान में रखकर ही अभियान छेड़ा गया। वाराणसी व लखनऊ से 15 दिन के अंदर ही चार लाख तिरासी हजार गैस सिलिंडर की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है। सहजनवां से जुड़े इन जिलों में प्रतिमाह नौ लाख 40 हजार गैस सिलिंडर की आपूर्ति की जाती है। बाढ़ के दौरान दिन-रात काम किया गया। गोरखपुर, महराजगंज, सिद्धार्थनगर सहित अन्य जिलों के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में 108 किलोलीटर केरोसिन की आपूर्ति रातोंरात सुनिश्चित कराई गई। यह स्थिति तब रही, जबकि यूपी में केरोसिन की आपूर्ति पर लंबे समय से प्रतिबंधित था।