उत्तर प्रदेश की कमान दूसरी बार संभालने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजनीति के अपराजेय योद्धा हैं। वह 1998 से 2017 तक लगातार गोरखपुर शहर लोकसभा क्षेत्र से सांसद का चुनाव जीतते रहे हैं। जितनी बार चुनाव लड़े, उतनी बार जीत का अंतर बढ़ गया। एक भी चुनाव में हार का सामना नहीं करना पड़ा है।
गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी बनने के बाद ही योगी आदित्यनाथ की सक्रियता बढ़ गई। गोरखनाथ मंदिर के अलग-अलग कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। महंत अवेद्यनाथ के चुनाव का संचालन भी करते रहे। 1998 में लोकसभा चुनाव का एलान हुआ तो तत्कालीन सांसद महंत अवैद्यनाथ ने असमर्थता जताई और योगी का नाम आगे बढ़ाया। यहीं से राजनीतिक पारी की शुरुआत हुई। योगी ने नामांकन कराया और राजनीति की पटरी पर सरपट दौड़ने लगे। भाजपा के टिकट पर पहला चुनाव लड़े और 25 हजार मतों के अंतर से जीतकर दिल्ली पहुंच गए।
भाजपा ने 2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया। इन्होंने पांच साल का कार्यकाल सफलता से पूरा किया। इस बीच सवाल उठा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में 37 वर्षों से कोई पार्टी दोबारा सत्ता में नहीं आई है। कोई मुख्यमंत्री दूसरा कार्यकाल नहीं पा सका है, लेकिन इस मिथक को भी योगी आदित्यनाथ ने तोड़ दिया। मुख्यमंत्री के घोषित चेहरे पर गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े और दोबारा मुख्यमंत्री बन गए। उत्तर प्रदेश में भाजपा को शानदार जीत मिली है।
छात्र आंदोलन से बनी बड़ी पहचान
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने की कहानी में कई उतार-चढ़ाव रहे हैं। गोरखपुर के गोलघर इलाके में गोरखनाथ मंदिर से संचालित इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ छात्र एक दुकान पर कपड़ा खरीदने के लिए गए और उनका दुकानदार से कुछ विवाद हो गया। मामला बढ़ा तो दुकानदार ने रिवॉल्वर निकाल लिया। घटना के दो दिन बाद दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई की मांग लेकर योगी के नेतृत्व में छात्रों ने उग्र प्रदर्शन किया। यहीं से योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक सफर की नींव पड़ गई। वह एसएसपी आवास की दीवार पर भी चढ़ गए थे। इससे पहले ही 15 फरवरी 1994 को नाथ संप्रदाय के प्रमुख मठ गोरखनाथ मंदिर के उत्तराधिकारी के रूप में अपने गुरु महंत अवेद्यनाथ से दीक्षा ली। इसके बाद गोरखपुर की राजनीति में महंत योगी आदित्यनाथ की धमाकेदार एंट्री हुई।
खुद बनाया कद, बड़े अंतर से जीते चुनाव
योगी के राजनीति में बढ़ते कद से भाजपा के तमाम दिग्गज असहज हो गए। नतीजा रहा कि भितरघात होने लगा। तमाम नेता उन्हें चुनाव हराने के प्रयास में जुट गए। भितरघात की वजह से ही 1999 का चुनाव योगी सात हजार वोट से जीत सके। इसका मतलब रहा कि 1998 के चुनाव से जीत का अंतर कम हो गया। वह पांच वर्षों तक सांसद रहे। सड़क से संसद तक संघर्ष के अपना कद बड़ा कर लिया। 2004 का लोकसभा चुनाव हुआ तो वह करीब डेढ़ लाख वोटों के अंतर से जीत गए। यह सिलसिला लगातार जारी रहा। गोरखपुर शहर लोकसभा क्षेत्र से पांच बार सांसद चुने गए।
हिंयुवा से मिली मजबूती
गोरखपुर का सांसद रहते हुए योगी आदित्यनाथ ने पूर्वांचल की राजनीति में सक्रियता बढ़ाई। मऊ और आजमगढ़ दंगों के बाद संघर्ष किया। साथ ही हिंदू युवा वाहिनी (हिंयुवा) का गठन करके खुद को मजबूत बनाया। हर बूथ, सेक्टर व मंडल के साथ ही उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में संगठन खड़ा कर दिया। इससे मजबूती मिली और राजनीतिक पारी अजेय होती चली गई।
नाराजगी बढ़ी तो भाजपा को मिली हार
2002 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ की नाराजगी का खामियाजा कद्दावर नेता शिव प्रताप शुक्ला को भुगतना पड़ा था। हुआ यह था कि किसी बात से नाराजगी बढ़ी और योगी ने हिंदू महासभा के टिकट पर डॉ. आरएमडी अग्रवाल को चुनाव मैदान में उतार दिया। भाजपा ने खूब जोर लगाया, लेकिन चुनाव परिणाम आया तो शिवप्रताप शुक्ला को हार का सामना करना पड़ा। इसकी जानकारी शीर्ष नेतृत्व को भी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। यह योगी के राजनीतिक कद को दर्शाता है।
हिंदू सम्मेलन में जुटी थी भीड़
योगी आदित्यनाथ ने हिश्व हिंदू महासंघ के बैनर तले हिंदू सम्मेलन कराके अपनी ताकत दिखाई थी। बताया जाता है कि भाजपा का सम्मेलन लखनऊ में हुआ था। इसमें भाजपा के सभी राष्ट्रीय नेता आए। इसी दिन योगी ने गोरखपुर में हिंदू सम्मेलन किया। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कई नेताओं ने योगी के साथ मंच साझा किया। लखनऊ से ज्यादा भीड़ गोरखपुर के हिंदू सम्मेलन में रही। इस घटना के बाद भी भाजपा ने योगी को 2004, 2009, 2014 में लोकसभा का प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा। 2017 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत मिली तो पार्टी ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया।