बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि ट्रेन में भी गाड़ियों की तरह एयर प्रेशर से ही ब्रेक लगता है। दरअसल, ट्रेन के ब्रेक में एक पाइप होता है, जिसमें हवा भरी होती है। यही हवा ब्रेक-शू को आगे-पीछे करती है और जब ब्रेक-शू पहिए पर रगड़ खाता है तो ब्रेक लगने लगता है। ब्रेक कब और किस स्थिति में लगाना है ये पूरी तरह ट्रेन के ड्राइवर (लोको पायलट) और गार्ड की सूझबूझ पर निर्भर करता है।
किस स्थिति में ट्रेन का ब्रेक लगाना जरूरी है? ये सवाल भी बहुत अहम है कि लोको पायलट ब्रेक कब लगा सकता है, ब्रेक लगाने के लिए उसे किस तरह का सिग्नल मिलता है। जैसे किसी भी सड़क पर ट्रैफिक संचालन के लिए तीन सिग्नल होते हैं, ऐसे ही रेलवे में भी तीन सिग्नल होते हैं- हरा, पीला और लाल।
हरा सिग्नल होने पर ट्रेन अपनी स्पीड से चलती रहती है, लेकिन जब पीला सिग्नल मिलता है तो लोको पायलट को ट्रेन की स्पीड कम करनी होती है। अगर लगातार पीला सिग्नल लोको पायलट को मिल रहा है तो उसे बार-बार अपनी स्पीड कम करने की जरूरत होती है। वहीं अगर लाल सिग्नल मिलता है तो लोको पायलट की ये जिम्मेदारी होती है कि वो सिग्नल से पहले ट्रेन रोक दे। अगर सिग्नल के पार ट्रेन चली जाएगी तो ओवरशूट कहते हैं।