गोरखपुर जिले के जिन आंगनबाड़ी केंद्रों के पास अपना भवन है, वहां भी न तो बच्चों के बैठने के लिए कोई प्रबंध है और न ही कार्यकर्ताओं के लिए। शौचालय, पेयजल, बिजली, खेलकूद के सामान आदि का प्रबंध भी बेहतर नहीं है। कर्मचारियों को अपने अभिलेख रखने के लिए कहीं फर्नीचर तक नहीं मिला है। ऐसे में आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री प्राइमरी स्कूल में बदलना आसान नहीं होगा।
जिले के 4237 आंगनबाड़ी केंद्र में से 3545 केंद्र ग्रामीण क्षेत्र में हैं। इनमें से केवल 643 के पास अपना भवन है। शेष 2902 केंद्र गांव के सरकारी स्कूल या पंचायत भवन में संचालित हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र संसाधनों की तंगी से जूझ रहे हैं। केंद्र पर कार्यकर्ताओं के पास अभिलेख रखने के लिए आलमारी तक नहीं है। सफाई, पेयजल, शौचालय, बिजली-पंखे आदि की व्यवस्था की बात करना ही बेमानी है। कई केंद्र तो ऐसे हैं जहां तक आने जाने का रास्ता भी ठीक नहीं है। भवनों की हालत ऐसी नहीं है कि लोग अपने छोटे बच्चों को वहां भेजने का साहस जुटा सकें।
हालत सुधारने का नहीं हो रहा प्रयास
बड़हलगंज विकास खंड के पटना में सात लाख रुपये की लागत से आंगनबाड़ी केंद्र का अपना भवन बना है। इस केंद्र पर मुख्यमंत्री के नाम का शिलापट्ट लगा है लेकिन यहां भी पर्याप्त संसाधन नहीं है। यहां की कार्यकर्ता सुमनलता गुप्ता, उर्मिला सिंह, सहायिका बिंदु, शकुंतला गुप्ता आदि ने बताया कि उनके यहां कुर्सी-मेज, आलमारी, बच्चों के बैठने आदि के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
केंद्र में बिजली-पानी का अभाव
कौड़ीराम विकासखंड के ग्राम पंचायत मलांव में आंगनबाड़ी केंद्र का भवन प्राथमिक विद्यालय के बगल में है। इस आंगनबाड़ी केंद्र में बिजली व पानी की व्यवस्था नहीं है। विद्यालय परिसर में बने शौचालय का ही प्रयोग आंगनबाड़ी केंद्र पर आने वाले बच्चे करते हैं।
भवन ही जर्जर है
भटहट ब्लॉक के गांव सोनराइच उर्फ बड़ा गांव में काफी पुराना आंगनबाड़ी केंद्र का भवन है जो अब जर्जर हो चुका है। इस केंद्र का संचालन गांव के प्राथमिक विद्यालय में होता है। जिस स्कूल में केंद्र है, वहां भी परिसर में बारिश का पानी एकत्र है।
पैसा खर्च हो गया लेकिन भवन अपूर्ण
सोहसा गांव में बन रहा केंद्र अभी अपूर्ण है। ग्राम प्रधान सत्येंद्र सिंह का कहना है कि भवन का बजट पहले ही खर्च हो चुका है लेकिन निर्माण अधूरा है। इसकी सूचना विभागीय अफसरों को दी जा चुकी है। यहां का केंद्र गांव के पंचायत भवन में संचालित होता है।
2902 केंद्रों को है अपने भवन का इंतजार
आंगनबाड़ी जैसी महत्वपूर्ण परियोजना के लिए भवन और अन्य संसाधनों का अभाव है। जिले में कुल संचालित 4237 में से 692 केंद्र शहरी और 3545 केंद्र ग्रामीण इलाके में हैं। ग्रामीण इलाके में अभी तक 674 केंद्र के लिए ही भवन निर्माण की मंजूरी मिली है। इनमें से 643 केंद्र पूर्ण हैं, जबकि 31 अपूर्ण हैं। जो 643 केंद्र पूर्ण हैं वहां भी केवल भवन ही है, फर्नीचर समेत अन्य संसाधनों का अभाव है। इनके निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठता रहता है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी हेमंत कुमार सिंह ने बताया कि शासन की तरफ से केंद्रों की हालत सुधारने व अन्य संसाधनों की व्यवस्था के लिए बजट नहीं मिला है। इसलिए पंचायतों में चल रही कायाकल्प योजना के तहत इन्हें भी शामिल कराने का प्रयास किया जा रहा है। जहां भवन अपूर्ण हैं, उन्हें जल्दी पूरा कराने का प्रयास हो रहा है।