मूलरूप से आजमगढ़ के शेखपुरा के रहने वाले अल्ताफ के पिता जावेद अहमद दर्जी का कार्य करते हैं। शिवली इंटर कॉलेज में 12वीं में पढ़ने वाले अल्ताफ तीन भाइयों में सबसे छोटे हैं। जब छह साल के थे तभी मिट्टी का मकान गिरने की वजह से उन्हें अपना एक हाथ गंवाना पड़ा। माता-पिता की आंखों के सामने तो अंधेरा ही छा गया। दोनों ने बेटे का हौसला बढ़ाया, स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया।
इस दौरान अल्ताफ ने अपने एथलीट चचेरे भाई को मैदान में पसीना बहाते देखा। पदक जीतते हुए देखा तो खेल के प्रति रुचि जगी। 15 साल की उम्र में मैदान पर उतरे, धीरे-धीरे प्रैक्टिस शुरू की। अब वे लगातार अपने प्रदर्शन से लोगों को चौंका रहे हैं।
गिर जाएगा, चोट लग जाएगी
अल्ताफ ने जब एथलेटिक्स में कॅरियर बनाने के बारे में सोचा तो सफर इतना आसान नहीं था। लोग प्रैक्टिस करते देखते थे तो गिर जाएगा, चोट लग जाएगी जैसी बातें बोलकर हतोत्साहित करते, मगर अल्ताफ ने कभी इसकी परवाह नहीं की। आज वे अपने प्रदर्शन से लोगों को मुंह बंद कर रहे हैं। उनका कहना है कि दिव्यांगता कोई कमजोरी नहीं है। अगर, कोई आप के घर में दिव्यांग हो तो उसे फेंकेंगे नहीं ना।