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मजेदार है इन गानों के पीछे की कहानी

Thu, 09 May 2013 04:24 PM IST
वेद विलास उनियाल
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फिल्म इंडस्ट्री में कुछ गाने ऐसे भी हुए हैं जिनके बनने की कहानी, गाने से कम मजेदार नहीं है। इन गानों का किस्सा यह है कि गाने किसी और को गाने थे लेकिन गाए किसी और ने। रोचक बात यह रही कि ऐसे प्रयोग ज्यादातर हिट भी रहे हैं।
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"चल री सजनी अब क्या सोचे"

'मुंबई का बाबू' फिल्म के लिए एसडी बर्मन ने धुन तैयार कर ली थी। वह इस गीत को किशोर कुमार से गवाना चाहते थे। पर किशोर कुमार उन्हें समय ही नहीं दे रहे थे। वैसे वह एसडी का बहुत सम्मान करते थे। पर वह मनमोजी किस्म के थे। जब एसडी बर्मन ने उन्हें बुलाया, वह कोई न कोई बहाना कर देते थे।

एसडी बर्मन ने कई दिन उनकी राह देखी। आखिर किसी ने एसडी बर्मन को सलाह दी कि आप किशोर के चक्कर में न पड़े। इसे किसी ओर से गवाएं। फिर एसडी बर्मन ने मुकेश से इस गीत को गवाया। यह गीत बहुत सराहा गया।
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"दिल के अरमा आंसुओं में बह गए"

'निकाह' के इस गीत के लिए रवि, आशा भोसले से गीत गवाना चाहते थे। रवि ने उनके अनुरूप धुनों को तैयार किया था। लेकिन सलमा आगा ने फिल्म के निर्माता निर्देशक से कहा वही इस फिल्म के गीतों को गाएंगी। आखिर रवि को मानना पड़ा।

लेकिन जिस रेंज पर उन्होंने आशा के लिए धुन तैयार की थी, उसमें थोड़ा बदलाव किया गया। क्योंकि उस रेंज पर सलमा आगा नहीं गा पा रही थीं। आखिर इस फिल्म के गीत सलमा आगा ने ही गाए। फिल्म के गीत बहुत पापुलर रहे।

"जिंदगी ये जिंदगी तेरे हैं दो रूप"

एसडी बर्मन ने इस खूबसूरत गीत के लिए मन्नाडे को रिहर्सल के लिए बुलाया। एसडी बर्मन पहले गीत को गाकर सुनाया करते थे। उन्होंने अपनी तर्ज पर इसे गाया तो मन्नाडे ने उनसे दोबारा गाने के लिए कहा। एसडी बर्मन ने जैसे ही दोबारा गीत को पूरा किया मन्नाडे ने कहा , आप इस गीत को इतना अच्छा गा रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि अब इसे मुझे गाना चाहिए।

एसडी बर्मन ने बहुत समझाया लेकिन मन्नाडे नहीं माने। आखिर एसडी बर्मन को ही गाना पड़ा। सुरैया के साथ भी ऐसा ही हुआ। एसडी बर्मन की आवाज में गीत सुनकर सुरैया इतनी मुग्ध हो गई कि उसने कहा, दद्दा आप ही इस गीत को गाइए। इस पर एसडी बर्मन ने कहा, नहीं मैंने यह गीत खासकर तौर पर तुम्हारे लिए ही बनाया है। इसे तुम्हें ही गाना होगा। आखिर यह गीत सुरैया ने ही गाया।

"आपसे हमको बिछुड़े हुए"

"आपसे हमको बिछुड़े हुए" बोल वाले इस गीत को गाने  के लिए मनहर और कंचन को ब्रेक मिला। इस गीत की धुन कल्याणजी आनंदजी ने बनाई थी। इसे मुकेश और लता को गाना था। लेकिन मुकेश दिल्ली में थे। कल्याणजी ने मनहर और कंचन की आवाज में डब कराया।

मुकेश दिल्ली से लौटे तो उन्हे यह गीत सुनाया गया। इसे सुनकर वह बोले, यह गीत अच्छा गाया गया है। इसी आवाज को लीजिए। कल्याणजी ने समझा मुकेश मजाक कर रहे हैं। लेकिन मुकेश ने जिद की और मनहर कंचन को यह गीत मिल गया।

"रहा गर्दिशों में हर दम"

फिल्म 'दो बदन' का यह गीत मोहम्मद रफी की आवाज में बहुत मशहूर हुआ था। पहले यह गीत किसी और फिल्म के लिए मुकेश की आवाज में रिकार्ड किया गया था। लेकिन उस फिल्म में यह गीत नहीं लिया जा सका। मनोज कुमार को यह गीत पसंद था।

आखिर जब 'दो बदन' फिल्म बनने लगी तो इस गीत को फिल्म में लेने पर विचार हुआ। लेकिन फिल्म के बाकी गीत रफी गा रहे थे। इसलिए इस गीत की धुन और रेंज में थोड़ा परिर्वतन करके इसे रफी की आवाज में ही लिया गया। यह गीत बहुत सुना गया।
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