भाषाओं की जननी कही जाने वाली हिंदी को लेकर लोगों में जुड़ाव है। समृद्ध भाषा के रूप में इसने अपनी पहचान को स्थापित किया है और लगातार लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ रही है। इस कड़ी में सरकारी विभागों में कार्यरत अधिकारियों ने हिंदी के महत्व को लेकर अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के माध्यम से अपने विचार साझा किए।
मैं मूलरूप से कर्नाटक का रहना वाला हूं। वहां पहली कक्षा से लेकर 10वीं कक्षा तक पढ़ाई जाती है। हिंदी भाषा को पढ़ने व लिखने से लोगों से जुड़ा जा सकता है। दिल्ली में तैनाती के दौरान दक्षिण भारतीय होने के बाद भी मुझे यहां अलग महसूस नहीं हुआ बल्कि हिंदी को सीखते हुए लोगों से जुड़ता चला गया। प्रशासन में रहते हुए हिंदी को सीखने को अच्छा अनुभव रहा है। इस भाषा में अपनेपन का अहसास मिलता है। कई बार हिंदी में कुछ ऐसे शब्दों को इस्तेमाल कर दिया जाता है, जिससे हिंदी को आम आदमी भी नहीं समझ पाता है। ऐसे में कामकाज में सरल हिंदी का प्रयोग होना जरूरी है। साथ ही साहित्यिक हिंदी की भी समझ होनी चाहिए।
-डॉ. सोमशेखर, अतिरिक्त एमएचओ, जनस्वास्थ्य विभाग, पूर्वी निगम
किसी भी देश की समृद्धि व क्रियाशीलता उस देश की मुख्य भाषा से प्रकट होती है। देश के कोने-कोने से लेकर कन्याकुमारी से कश्मीर तक हिंदी बोली व पढ़ी जाती है। यह न केवल आर्थिक विकास की बात है बल्कि धार्मिक व सांस्कृतिक विविधता भी भाषा से ही सामने आती है। यह सच है कि जब इंसान अपनी भाषा में बात करता है तो भावनाओं के साथ बात करता है। वहीं, दूसरी भाषा में बात करते हुए भाषा की शैली पर ध्यान देना होता है। अपनी भाषा में बात करते हुए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता है। कुछ इसी तरह की सरल और सहज भाषा है हिंदी। हिंदी आजादी का अहसास कराने वाली भाषा है। हमनें पूर्व में प्रण किया था कि दूसरी भाषाओं पर से निर्भरता कम कर अपनी भाषा को आगे बढ़ांएगे, लेकिन आज स्थिति इससे अलग है। आज जितने भी देश विकसित हुए हैं वे सब अपनी भाषा में विकसित हुए हैं और लगातार भाषा को लेकर काम भी कर रहे हैं। हमें भी अपनी हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए काम करना चाहिए। क्योंकि, आपस में रिश्तों को जोड़े रखने के लिए इस भाषा का कोई विकल्प नहीं है।
-प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन, अध्यक्ष हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय