डेंगू संक्रमण को लेकर लगातार दिल्ली के अस्पतालों से अव्यवस्थाओं की तस्वीरें सामने आ रही हैं, लेकिन हालात फिर भी जस के तस बने हैं। इन्हीं अव्यवस्थाओं के चलते राजधानी में एक युवक की मौत हो गई। 48 घंटे तक तीन-तीन अस्पतालों में चक्कर लगाने के बाद भी जब कहीं भी बिस्तर नहीं मिला तो आखिर में परिजन मरीज को लेकर द्वारका स्थित आकाश अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
डॉक्टरों ने बताया कि मरीज की तबीयत काफी गंभीर थी इसलिए उसे बचाया नहीं जा सका। सरकारी आंकड़ों की मानें तो डेंगू संक्रमण की वजह से यह दिल्ली में दूसरी मौत है। जबकि अलग अलग अस्पतालों के अनुसार यह 26 वीं मौत है। बुधवार शाम तक इन अस्पतालों में 21 मरीजों की मौत डेंगू से हो चुकी थी।
हरी नगर निवासी कृष्ण कुमार ने बताया कि उनका 26 वर्षीय इकलौता बेटा आतिश डेंगू संक्रमित था। 25 अक्तूबर को वे बेटे को लेकर आरएमएल अस्पताल पहुंचे थे, जहां कई घंटे इंतजार के बाद जब उनका नंबर आया तो डॉक्टरों ने पर्ची पर ही लिख दिया कि उनके यहां कोई बिस्तर खाली नहीं है। मरीज को कहीं और ले जाकर इलाज करवा सकते हैं। हालांकि इस दौरान मरीज की हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने अस्थायी उपचार जरूर किया था।
प्राइवेट अस्पताल में तोड़ा दम
कृष्ण कुमार ने बताया कि वे 24 और 25 अक्तूबर को पूरे दो दिन दिल्ली के अलग अलग अस्पतालों में चक्कर लगा रहे थे, लेकिन कोई उनकी सुनवाई करने वाला नहीं था। सबसे पहले दिल्ली सरकार के डीडीयू अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन वहां एक बेड पर दो या तीन मरीज देख वे डर गए और मरीज को लेकर माता चानन देवी अस्पताल पहुंचे। यहां भी कोई बिस्तर नहीं मिला तो वे केंद्र सरकार के आरएमएल अस्पताल पहुंचे। तीनों अस्पतालों में जब उनको इलाज नहीं मिला तब जाकर रिश्तेदारों की मदद से उन्होंने अपना बेटा प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया, जहां सुबह साढ़े पांच बजे मरीज ने दम तोड़ दिया।
सरकारें कोई भी हों, दावे सबके झूठे
कृष्ण कुमार बताते हैं कि दिल्ली में अलग अलग सरकारें अपना दावा करती हैं। फिर चाहे वह केंद्र, राज्य या फिर निगम की सरकार क्यों न हो? हर कोई खुद को बेहतर बता रहा है लेकिन सच यह है कि सरकारें कोई भी हों, इनका दावा झूठा ही है। उन्हें न दिल्ली सरकार और केंद्र के अस्पताल में बेड मिला। अगर समय पर इलाज मिल जाता तो शायद उनके बेटे को डॉक्टर बचा लेते और परिवार का इकलौता सहारा उनसे अलग नहीं होता। इसी तरह नगर निगम का यह दावा भी झूठा है कि वह फॉगिंग करा रहे हैं। उनके यहां कभी भी कोई फॉगिंग नहीं हुई। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका परिवार सरकारों की घोर लापरवाही का शिकार होगा।
घट रहीं थीं प्लेटलेट्स, क्यों नहीं दिया ध्यान
परिजनों के अनुसार 24 अक्तूबर की रात ही आतिश के शरीर में प्लेटलेट्स का स्तर 11 हजार तक पहुंच गया था। हालांकि चिकित्सीय तौर पर देखें तो 10 हजार प्लेटलेट्स या फिर शरीर में रक्तस्त्राव होने तक जोखिम नहीं माना जाता है लेकिन अगर प्लेटलेट्स लगातार घट रही हो तो चिंता की बात भी है। ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि तीनों अस्पतालों ने प्लेटलेट्स को लेकर ध्यान क्यों नहीं दिया? परिजनों का कहना है कि बिस्तर नहीं था तो कम से कम उसे प्लेटलेट्स चढ़ाने में ही डॉक्टरों को मदद करनी चाहिए थी।