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होम्योपैथी की मदद से करें लेबर पेन को दूर

Wed, 21 Dec 2016 05:08 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाल, दिल्ली
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देखरेख व सावधानी बरतते हुए बच्चों की नॉर्मल डिलिवरी करवाई जाती है पर कभी-कभी चीजें हमारे हिसाब से नहीं हो पाती हैं। कुछ लोगों को प्रसव के समय काफी तकलीफें उठानी पड़ती हैं। हालांकि, होम्योपैथी की थोड़ी सी जानकारी आपके लिए काफी मददगार साबित हो सकती है।
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अग्रवाल होम्यो क्लिनिक के सीनियर होम्योपैथी फिजिशियन डॉ. पंकज अग्रवाल बताते हैं होम्योपैथी में हर मर्ज का इलाज है, जो अकसर सफल भी साबित होते हैं। इसके इलाज नॉन टॉक्सिक होने के साथ शरीर को हर बीमारी से लडने के लिए तैयार करते हैं। 200 साल के इसके इतिहास में गर्भावस्था और प्रसव के किसी भी मामले में किसी समस्या की रिपोर्ट नहीं आई है।

लेबर एक ऐसा प्राकृतिक प्रोसेस है, जो स्त्री के गर्भ ठहरने के कुछ महीने बाद से शुरू होता है। यह परिपक्वता हर स्त्री में भिन्न हो सकती है क्योंकि हर स्त्री दूसरे से कई मायनों में अलग होती है। यह भिन्नता शारीरिक व मानसिक (साइको-स्पिरिचुअल, साइको-सोशल, सोशियो-इकोनॉमिकल) फैक्टर्स पर निर्भर करती है।
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इन फैक्टर्स को समझते हुए हर हेल्थ प्रोफेशनल कुछ बातों को ध्यान में रखता है
1. पीठ के बल लेटना
2. डर
3. वातावरण तनावयुक्त होना
4. आर्टिफिशियल ऑक्सीटॉसिन से इंडक्शन करना
5. किसी तरह के प्राकृतिक दर्द निवारक विकल्पों का ज्ञान न होना
6. जब बच्चे के सिर के पीछे का हिस्सा मां की पीठ के पीछे हो
7. पानी की कमी होना

डॉ. पंकज अग्रवाल के मुताबिक अभी तक मेडिकल साइंस को यह पता नहीं चल सका है कि इस भ्रूण के परिपक्व होने या लेबर इंडक्शन के शुरू होने में कितना समय लगता है। न ही इस बात की जानकारी मिल सकी है कि इंडक्शन का प्रोसेस किस तरह से चलता है। हालांकि, अभी तक यह समझा गया है कि साइकिक, नर्वस सिस्टम और एंडोक्राइनल सिस्टम के एक को ऑर्डिनेशन में काम करने से लेबर इंडक्शन की शुरुआत होती है।

हर शारीरिक क्रिया की तरह लेबर की यह क्रिया भी किसी महत्वपूर्ण ऊर्जा के तहत होती है, जिसे साइकोलॉजी में सेल्फ, यानी कि स्वयं कहते हैं। मेडिकल साइंस के सारे अनुत्तरित प्रश्नों पर रिसर्च चल रही है, जिन्हें एक नए डिसिप्लिन में रखा गया है, जिसे पीएनआई ,यानी कि साइको-न्यूरो-इम्यूनोलॉजी कहते हैं। होम्योपैथिक दवाओं का प्रभाव प्राकृतिक होता है।

डॉ. पंकज अग्रवाल के अनुसार अपने शरीर को लेबर प्रक्रिया के लिए तैयार करने के लिए होम्योपैथिक इलाज सबसे कारगर व सुरक्षित विकल्प है। इलाज की ये प्रक्रियाएं जच्चा और बच्चा, दोनों के लिए ही बिलकुल सुरक्षित मानी जाती हैं। इसमें दी जाने वाली दवाओं का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यहां तक कि गलत दवाएं लेने पर भी किसी तरह का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। 

दवाओं को डोसेज कब खत्म करें? 
दवाओं का डोसेज कितना और किस तरह से तय किया जाए, यह सिस्टम के मूल सिद्धांतों पर निर्भर करता है। होम्योपैथी में डोसेज तीन जरूरी बातों पर निर्भर करता है - 
1. पोटेंसी, यानी कि दवा का पावर
2. क्वॉन्टम, यानी कि एक समय पर कितनी मात्रा ली जाए
3. रिपिटीशन, यानी कि फ्रीक्वेंसी, कितनी बार उस दवा को लिया जाना है

डॉ. पंकज अग्रवाल ने ये बताया कि डोसेज निर्धारित करते समय मरीज की सेंसिटिविटी का ध्यान रखा जाता है। गर्भावस्था एक शारीरिक क्रिया है, न कि कोई बीमारी। गर्भवती स्त्री बेहद नाजुक हो जाती है क्योंकि उसके गर्भ में एक नया जीवन पल रहा होता है और वह हर हाल में उसे सर्वश्रेष्ठ रूप देना चाहती है। लेबर का समय नजदीक आते-आते स्त्री और नाजुक हो जाती है क्योंकि उसे हर वक्त अपने होने वाले बच्चे की सुरक्षा की चिंता होती है। इस स्थिति में स्त्री को पिल्स के फॉर्मेट में 200 सी पावर की दवाएं दी जा सकती हैं। लेबर इंडक्शन के सकारात्मक प्रभाव पाने के  लिए कभी-कभी एक डोज ही काफी होती है।

हालांकि, हर स्त्री की नाजुकता व शारीरिक हालत को देखते हुए दवाओं का डोज घटाया या बढ़ाया जा सकता है। होम्योपैथिक दवाएं लेते समय बहुत ज्यादा सजगता बरतने की जरूरत नहीं होती है, प्रिकॉशन बस व्यक्ति और उसकी स्थिति पर ही निर्भर करते हैं। गर्भवती स्त्री के लिहाज से देखा जाए तो उसकी स्थिति ऐसी होती है कि कई बार कुछ खाने -पीने की इच्छा भी नहीं करती, इसलिए ऐसे में किसी प्रकार का एहतियात बरतने की जरूरत नहीं होती।
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