रमेश कुमार अंबाला गन हाउस के मालिक अमित राव के यहां दस हजार प्रति माह तनख्वाह में नौकरी करता था। तनख्वाह कम होने के कारण उसने अमित राव से कहा कि अगर वह ग्रे बाजार में कारतूस बेचेंगे तो जल्दी ज्यादा कमाई कर सकेंगे। अमित गोला बारूद बनाने वाली कंपनी से कारतूस खरीदता था और उनकी ठीक से रिकार्ड बुक में एंट्री नहीं करता था। इसके बाद महंगे दामों पर दीपांशु व अन्य लोगों को कारतूस कारतूस बेचते थे।
मार्केटिंग में एमबीए करने वाला दीपांशु नोएडा में एक साफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। इसके पिता का इटावा में गन हाउस था। पिता की मौत के बाद इसने वर्ष 2015 में गन हाउस बंद कर दिया था। ये रमेश से कारतूस लेकर तस्करी करने लगा। दीपांशु एक कारतूस 125 रुपये में लेकर 200 से 250 रुपये में आगे बेचता था।
अमित ने भी एमबीए किया हुआ है-
कुरूक्षेत्र यूनिवर्सिटी से एमबीए करने वाला अमित होटल मैनेजमेंट का कोर्स भी किया हुआ है। ये कई प्रतिष्ठित होटल में काम कर चुका है। इसके मामा का अंबाला गन हाउस था। इसके बाद इसे गन हाउस का लाइसेंस मिल गया। ये जयपुर में एक इंस्टीट्यूट में बतौर एडमिन हैड का काम कर चुका है। ये पूणे स्थित कंपनी से 80 रुपये में कारतूस लेता था। ये इनका रिकार्ड बुक में इंट्री नहीं करता था। ये एक कारतूस को आगे 125 रुपये में बेचता था। मुजफ्फनगर निवासी इकराम व अकरम दोनों सगे भाई हैं। ये गन रिपयेङ्क्षरंग का काम करते थे। रमेश के संपर्क में आने कारतूसों की तस्करी करने लगे। मनोज कुमार के पास आम्र्स लाइसेंस हैं। इसकी आड़ में ये कारतूसों की तस्करी करता था।