हाईकोर्ट ने द्वारका इलाके में दो वर्ष पूर्व दिनदहाड़े प्रोपटी डीलर व उसके साथी की हत्या के आरोपी अक्षय डागर उर्फ शक्ति को निचली अदालत से प्रदान जमानत को रद्द कर दिया। हाइकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कई अहम तथ्यों को नजरअंदाज कर आरोपी को जमानत दी है जबकि आरोपी पर लगे जघन्य आरोप को देखते हुए वह जमानत का हकदार नहीं है।
न्यायमूर्ति सुब्रामण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में दिल्ली पुलिस की जमानत प्रदान करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि आरोपी इस मामले के अलावा एक अन्य हत्य मामले में भी आरोपी है। वह इस हत्याकांड के बाद फरार था और अदालत ने उसे भगौड़ा करार दिया था। पुलिस ने उसे किसी अन्य मामले में गिरफ्तार किया तभी इस मामले में उसकी गिरफ्तारी हुई।
उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस तथ्य को भी नजर अंदाज किया आरोपी के फरार होने के अलावा उससे मृतक की मां व पत्नी को जान का खतरा है और दोनों मामले में अहम गवाह है। उन्होंने ही आरोपी की पहचान की थी व निचली अदालत ने मां-पत्नी को सुरक्षा प्रदान की हुई है। इसी प्रकार अन्य गवाहों ने भी व्यक्तिगत रूप से गवाही के लिए कोर्ट में इस तर्क पर आने से इंकार कर दिया था कि उनकी जान को खतरा है। इसके अलावा आरोपी ने योजनबद्घ तरीके से हत्या का योजना बनाई व उसे अंजाम भी करवाया।
अदालत ने कहा कि जमानत हमेशा तथ्यों, अपराध की गंभीरता व प्रकृति को ध्यान में रख कर दी जाती है लेकिन इस मामले में सभी तथ्य आरोपी के खिलाफ है। इससे पूर्व दिल्ली पुलिस ने निचली अदालत के 4 दिसंबर 20 के फैसले को चुनौती देते हुए तर्क रखा कि आरोपी जघन्य अपराध में लिप्त रहा है और उसके खिलाफ तीन अन्य मामले विचाराधीन है। आरोपी पर लगे आरोप में न्यूनतम आजीवन कारावास व अधिकतम मृत्युदंड का प्रावधान है। पीड़ित परिवार को उससे जान का खतरा है।
पेश मामले के अनुसार 2 मई 18 को कार में जा रहे प्रोपार्टी डीलर संदीप देशवाल व पवन मान की कार व बाईक पर सवार आरोपियों ने गोलियां मार कर हत्या कर दी थी। मृतक की मां ने सीसीवीटी फुटेज के आधार पर एक आरोपी राजीव डागर की पहचान की थी। इसके अलावा उसने बाइक व कार की भी पहचान की थी जिसमें राजीव डागर उनके घर आता था। यह हत्याकांड प्रोपटी को लेकर हुए विवाद में की गई थी।
बचाव पक्ष ने हालांकि तर्क रखा कि अभियोजन पक्ष के दो गवाह मुकर गए है और उनके मुवक्किल के खिलाफ ठोस साक्ष्य नहीं है लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।