दीवारों पर नारे लिखे, रात में निकाला जुलूस
जादी के समय उनकी उम्र 9-10 वर्ष थी। घर पर जब आजादी मिलने की बात पता लगी तो भाइयों के साथ बाहर निकल पड़ी। हमने तय किया कि गलियों में आजादी के नारे लिखने हैं। रंग व कालिख जुटाई और रात में ही दीवारों को नारों से रंग दिया। रात भर गांव में सबकी जुबान पर आजादी मिलने की ही बात थी। याद पड़ता है कि घर के बड़ों ने मिलकर तय किया कि सुबह सब जश्न मनाएंगे। फिर क्या था? सुबह का इंतजार कौन करता। 14 अगस्त की रात दो बजे ही निकल पड़े। घर के बाहर देखा तो काफी लोग नारे लगाते हुए जुलूस के रूप में जा रहे थे। उनके साथ ही जुलूस में शामिल हो गए। दिन भर भागदौड़ ही चलती रही। पहली बार सबने अपने-अपने हिसाब से खुशी का इजहार किया। बाद के आयोजन योजना के अनुसार होने लगे।
-रामरती यादव, नांगलोई सईदान
पहले दिन की यादें सुनहरी हैं...
पंद्रह अगस्त की सुबह हमने आजाद हिंदुस्तान में सांस ली थी। उस वक्त मेरी उम्र 14 साल के करीब थी। उस दिन तड़के ही नींद खुल गई। पहले पिताजी के साथ यमुना में स्नान किया। वहां से लौटने तक लाल किले के सामने करीब 200 लोग जमा थे। प्रधानमंत्री के आने से पहले पुरुषों और महिलाओं ने प्रभात फेरियां निकालीं। ढोल-मजीरा बजाते, आजादी के तराने गाते-गाते सब आगे बढ़ रहे थे। याद आता है, चांदनी चौक में मियां करीम की दुकान का छप्पर। जहां शाम को मुफ्त में भोजन परोसा गया। ऊंची मजार पर देर रात तक महफिल सजी। मैदान की गुफ्तगूं भी याद आती है। आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाए जाते।
-लाला श्याम लाल, मालीवाड़ा, नई सड़क, चांदनी चौक