नई दिल्ली। राज्यपाल को कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कथित कमी से हुई मौतों की जांच के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) के गठन पर आपत्ति जताने का कोई अधिकार नहीं है। उसका कोई कारण या कानूनी औचित्य भी नहीं है। दिल्ली सरकार ने ये बात हाईकोर्ट से कही है।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी एवं न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ के समक्ष सरकार ने यह बात हलफनामा दाखिल कर कही है। साथ ही उसने सरकार के उच्चाधिकार प्राप्त समिति के गठन के निर्णय को अंतिम और बाध्यकारी माना जाने की बात की है। पीठ ने इस पर उपराज्यपाल कार्यालय को दो सप्ताह में जवाब देने को कहा है। मामले की सुनवाई 21 सितंबर तय की है।
दिल्ली सरकार ने कहा कि एचपीसी के संविधान में हस्तक्षेप करने को लेकर उपराज्यपाल की 8 जून की नोटिंग में बताए गए कारण गलत हैं। साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 239एए (4) के तहत दी गई शक्ति के प्रयोग के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित प्रावधान के अनुरूप नहीं हैं। सरकार ने यह जवाब प्रीति सिंह वर्मा की याचिका पर दाखिल किया है।
कोरोना महामारी के दूसरी लहर के दौरान याचिकाकर्ता के 34 वर्षीय पति की मृत्यु हो गई थी। उसने दिल्ली सरकार को एचपीसी को संचालित करने, उसके मामले को समिति को सौंपने और सिफारिशों के अनुसार मुआवजा देने की मांग की है। महिला ने कहा कि उसके पति को 10 मई को कोरोना के इलाज के लिए यहां एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसने कहा कि 14 मई को दिल का दौरा पड़ने से उसके पति का निधन हो गया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उसे महामारी की दूसरी लहर के दौरान व्यक्तियों की मौत के मामलों की जांच करने के लिए दिल्ली सरकार की एचपीसी के गठन के बारे में पता चला। उपराज्यपाल ने समिति के गठन को स्थगित रखा है। याचिका के जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा कि 27 मई को एचपीसी का गठन किया गया था, लेकिन इसके गठन के आदेश को 31 मई को स्थगित किया गया था।