दुष्कर्म, शरीर पर महज एक हमला नहीं बल्कि पीड़िता की मानसिक स्थिति या पूरे व्यक्तित्व को नष्ट कर सकता है। अपनी बहू से दुष्कर्म के 65 वर्षीय आरोपी को उच्च न्यायालय ने जमानत देने से इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने आदेश में यह भी कहा कि दुष्कर्म एक बेहद जघन्य अपराध है और इसका असर पीड़िता पर वर्षों तक बना रह सकता है।
यह एक अत्यंत जघन्य अपराध
बृहस्पतिवार को पारित आदेश में जमानत याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता पर बहू के साथ दुष्कर्म का आरोप है और पीड़िता को धमकी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के दो महीने बाद एफआईआर दर्ज करने का मतलब यह नहीं है कि बहू ने झूठा मामला दर्ज करवाया है। यह एक अत्यंत जघन्य अपराध है, जिसमें न्यूनतम 7 साल की सजा का प्रावधान है। इस अपराध में आजीवन कारावास भी हो सकता है।
इस आघात का असर वर्षों तक बना रह सकता है
एफआईआर में कहा गया है कि पीड़िता (बहू) डरी हुई थी इसलिए अपने माता-पिता को इस घटना के बारे में बताने से हिचकिचा रही थी। जब याचिकाकर्ता की ओर से उसे बार-बार प्रताड़ित किया गया तो उसने हिम्मत जुटाई। अदालत ने यह भी कहा कि दुष्कर्म केवल शरीर पर किया महज एक हमला नहीं है बल्कि पीड़िता के व्यक्तित्व के लिए विनाशकारी भी कई बार होता है। इस आघात का असर वर्षों तक बना रह सकता है। याचिकाकर्ता ने जमानत याचिका में कहा है कि एक वैवाहिक विवाद से ऐसी स्थिति पैदा होने पर बहू की तरफ से परिवार के सभी सदस्यों को फंसाने की कोशिश की जा रही है।