भगवान देवी के दो भाइयों की मौत कोरोना से हो गई थी
- फोटो : अमर उजाला
क्या राखी, क्या भैयादूज, उमंग किसी त्योहार में नहीं बची। खुशी देने की जगह यह सब जख्म ताजे कर जाते हैं। पुराना घाव दोबारा से रिसने लगता है। राखी पर तो चीख पड़ने का मन करता है। बात करते-करते रमा का गला भर आया। आंखें नम थीं। अजीब सी खामोशी छा गई। आंखों से आंसू टपक रहे थे। थोड़ी देर में खुद को संभाला और रूंधे गले से बोल पड़ी कि भाई होता था तो घर की रौनक बदल जाती थी। पूरा घर सजा होता था। हम सब सज-धज कर मिठाई और तोहफे लाते। मां के पास जाते तो अब भी हैं, लेकिन पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा। दो साल होने को आए, घर में अभी भी मातम सा पसरा रहता है।
बात 2020 की है। दूसरे परिवारों की तरह कोविड का साया करावल नगर के दयालपुर एक्सटेंशन में रहने वाली रमा के परिवार पर भी पड़ा। घर के तीन सदस्य- पिता, मां और भाई इसकी चपेट में आ गए। मां तो किसी तरह बच गई, लेकिन हफ्ते भर के भीतर कोरोना पिता-पुत्र को निगल गया था। आज भी उसको याद कर तीनों बहनों रमा, उमा और भारती की आंखों से आंसू बहने लगे।