बातचीत चल ही रही थी कि एक साथ कुछ लोग कैफे में दाखिल हुए । अचानक इतने सारे लोगों को अगल-बगल देखकर एक पल को मिश्रा सकपका गए। वह कुछ बोलते, इससे पहले ही घेरा बनाए लोगों में से एक व्यक्ति बोला, चलिये आप।
मिश्रा ने खुद को संभालने की कोशिश करते हुए पूछा- कहां? हम विजिलेंस से हैं, आए लोगों में से एक ने जवाब दिया । इतना सुनते ही, मिश्रा का लहजा और तल्ख हो गया। बैठे-बैठे रौबदार लहजे में सवाल किया- पहचान रहे हो मुझे ? सामने से सख्त लहजे में शालीन जवाब मिला-जी मिश्रा जी, चलिये आप गाड़ी में तो बैठिए।
शायद मिश्रा मौके की नजाकत को भांप गए थे, पेशानी पर बल पड़ गया। क्या करें और क्या न करें के हजारों भाव पल भर में चेहरे पर पसर गई। एक गहरी खामोशी माहौल में तैर गई। उसे विजलेंसकर्मी ने तोड़ा, अब चलिए भी कहते हुए उसने बिना जवाब का इंतजार किए, मिश्रा के कमर में हाथ डालते हुए उनको उठा लिया और साथ चलने पर विवश कर दिया।
मिश्रा ने चाय के भुगतान की मंशा जाहिर की तो विजलेंसकर्मियों ने उसे भी अनसुना कर दिया। मिश्रा का इस कैफे में अक्सर आना होता था, लिहाजा वहां मौजूद कर्मचारी भी यह नजारा देखकर अवाक रह गए। उनकी समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है।
चलते-चलते मिश्रा ने उनसे कहा...हिसाब-किताब बाद में कर लेंगे, जवाब में कर्मचारियों ने हां में सिर हिला दिया। इसके बाद टीम मिश्रा को कैफे से बाहर लेकर आई। सड़क के दूसरी ओर विजिलेंस की गाड़ी खड़ी थी। मिश्रा फिर कुछ बोले, लेकिन विजिलेंसकर्मियों ने उनकी एक नहीं सुनी। एक कर्मी ने कमर में हाथ अड़ाया और कुछ खीचते हुए सड़क पार कराई, उन्हें गाड़ी में बैठाया और चलते बने।