एक दौर था कि चुनावों में किसी राजनीतिक पार्टी के प्रचार वाहन के आते ही बच्चों की टोलियां गलियों में दौड़ने लगती थीं। कोई जीते कोई हारे उन्हें फर्क नहीं पड़ता था। उन्हें तो बस एक बिल्ला, एक झंडा की दरकार रहती थी। उस वक्त प्रचार का माध्यम बैच और बिल्ले ही होते थे।अब ऐसा नहीं दिखाई देता है। कोरोनाकाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में तो बिल्कुल भी नहीं।
कोविड और आचार संहिता नियमों के चलते चुनावी प्रचार पूरी तरह मोबाइल व सोशल मीडिया तक सीमित हो गया है। दो दशक पहले जैसे ही चुनावी बिगुल बजता था तो रौनक दिखने लगती थी। नामांकन के बाद चुनाव चिह्न मिलते ही प्रत्याशी चुनाव चिह्न वाले बिल्ले, झंडे और कपड़े की टोपियां प्रिटिग छपवाते थे।
चुनाव प्रचार के लिए जैसे ही समर्थकों की टोली लाउडस्पीकर बजाते हुए गुजरती थी तो चुनाव से अंजान बच्चे बस बिल्ले और टोपी लेने के लिए दौड़ पड़ते थे। बच्चे बिल्लों को अपनी कमीज और टोपियां पहनकर घूमते थे। प्रत्याशी के पक्ष में नारे भी लगाते।चुनाव आयोग की सख्ती, प्रचार-प्रसार के लिए खर्चे तय होने और कोरोनाकाल में अब बिल्ले और टोपियां गायब हो गई हैं। कनखल के पहाड़ी बाजार निवासी सतेंद्र सिंह बताते हैं कि कांग्रेस और जनता पार्टी के दौर में बिल्लों को लेकर बड़ा आकर्षण होता था। चुनाव प्रचार में दादा जाते थे। उनके लाए हुए बिल्लों को पोता सीने पर लगाकर चौड़ा होकर घूमता था।