समय के साथ क्राइम और अपराधी हाइटेक हो गए, लेकिन सूबे के 60 प्रतिशत हिस्से में अब भी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी अप्रशिक्षित राजस्व पुलिस (पटवारी) के हाथों में है। सिर्फ 40 प्रतिशत क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्ता का जिम्मा सिविल पुलिस के कंधों पर है। ब्रिटिश काल से काम कर रही राजस्व पुलिस को न तो किसी तरह के प्रशिक्षण की जरूरत महसूस हुई और नहीं उसके संसाधनों में बढ़ोतरी की।
राजस्व क्षेत्र में हावी पंचायती व्यवस्था भी किसी से छिपी नहीं है। देश में उत्तराखंड अकेला राज्य है, जहां आज भी राजस्व पुलिस काम कर रही है। ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार को छोड़कर प्रदेश के देहरादून, रुद्रप्रयाग, नैनीताल, बागेश्वर, चमोली, पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा, टिहरी, उत्तरकाशी और पौड़ी का 60 प्रतिशत इलाका राजस्व पुलिस के अधीन है।
यह बात अलग है कि प्रदेश की आबादी का 60 प्रतिशत पुलिस के हिस्से में है। एक नहीं ऐसे अनेक उदाहरण है, जब राजस्व क्षेत्रों में दबंगों ने कानून को ठेंगा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि वहां भी रेग्यूलर पुलिस होती है तो शायद ऐसी घटनाएं न होतीं या उन्हें जल्दी सुलझा लिया जाता। उत्तरकाशी में एसटीएफ के सिपाही की हत्या और अब चकराता क्षेत्र में सांसद तरुण विजय पर हुए हमले के बाद राजस्व पुलिस के अस्तित्व को लेकर नई बहस छिड़ गई है।