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उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा होगी और भी आसान, आर्थिकी को भी मिलेगी पहचान

Thu, 18 Feb 2021 10:36 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पिथौरागढ़
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कैलाश मानसरोवर - फोटो : फाइल फोटो
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उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को व्यापक तौर पर संचालित करने के राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी के प्रयासों का कुमाऊं में व्यापक स्वागत हुआ है। लोगों का कहना है कि यात्रा का विस्तार होने से सीमांत इलाकों के बाशिंदों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। केएमवीएन की आय के साथ ही इस यात्रा से जुड़े पौनी-पोर्टर्स, व्यापारी, वाहन संचालक और स्थानीय व्यवसायियों को फायदा होगा। 

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राज्यसभा सांसद व भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी ने विगत दिवस नई दिल्ली में विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात कर उत्तराखंड से कैलाश मानसरोवर यात्रा के व्यापक संचालन का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि लिपुलेख, पिथौरागढ़ से सहज और सुगम यात्रा का विकल्प तैयार हो सकता है। ऐसा होने पर यह यात्रा उत्तराखंड की आर्थिकी व पर्यटन की लाइफ लाइन बन सकती है।

बलूनी की इस बात से उत्तराखंड के बेहतरी से सरोकार रखने वाले तमाम लोग इत्तफाक रखते हैं। सीमित रूप में होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा से हर साल उत्तराखंड के सीमांत इलाके में लोगों को अच्छा खासा रोजगार मिलता है। पर्वतीय व्यंजनों और पहाड़ी परिवेश की थीम पर चलने वाले होम स्टे, पोर्टर के साथ ही यात्रा संचालक कुमाऊं मंडल विकास निगम की आय का भी यह प्रमुख जरिया है। यात्रा को बड़े पैमाने पर संचालित करने से इन लोगों के लिए वर्षभर रोजगार के द्वार तो खुलेंगे ही, साथ ही सीमांत का पर्यटन विकास भी संभव हो सकेगा। लोगों का मानना है कि यह निश्चिति रूप से महत्वाकांक्षी विचार है। 
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अभी चुनौतीपूर्ण है यात्रा
लिपुलेख दर्रे से होकर की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को प्रशासन, कुमाऊं मंडल विकास निगम, पुलिस एवं आईटीबीपी ने अत्यधिक दुर्गम और चुनौतीपूर्ण की श्रेणी में रखा है। दिल्ली से लिपुलेख तक 696 किलोमीटर की इस यात्रा में कई प्रकार के अवरोध आते रहते हैं। अभी यात्रा ठीक मानसून सीजन में होती है, इस कारण सड़क मार्ग के अलावा पैदल मार्गों पर हर समय खतरा बना रहता है। यात्रियों को 16730 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रे को पार कर तिब्बत में प्रवेश करना पड़ता है। यह बात अलग है कि तिब्बत में कैलाश परिक्रमा क्षेत्र में यात्रियों को कम से कम आवागमन और संचार की कोई दिक्कत नहीं होती।

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कैलाश-मानसरोवर की महत्ता

कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। पुराणों के अनुसार इस स्थान को 12 ज्योतिर्लिंग में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कैलाश बर्फ  से आच्छादित 22,028 फुट ऊंचे शिखर और उससे लगे मानसरोवर को कैलाश मानसरोवर तीर्थ कहते हैं और इस प्रदेश को मानस खंड कहते हैं। मानसरोवर झील इलाके में 320 वर्ग किलोमाटर के क्षेत्र में फैली है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत और पश्चिम में राक्षसताल है। यह समुद्रतल से लगभग 4556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मान्यता है कि मानसरोवर झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुई थी इसलिए मानसरोवर कहते हैं क्योंकि ये मानस और सरोवर से मिलकर बनी है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, मन का सरोवर। यहां देवी सती के शरीर का दायां हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है।

उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को निर्बाध और सुगम बनाया जाना आवश्यक है। भारत की ओर से आयोजित की जाने वाली यात्रा अब भी कठिन है। दूसरी तरफ अनेक निजी संचालक हेलीकॉप्टर और दूसरे संसाधनों से दूसरे रास्तों से सुविधाजनक यात्रा कराते हैं। जहां तक यात्रियों की संख्या बढ़ाने का सवाल है तो वह केवल सरकार की ओर से सुविधा बढ़ाने से ही संभव नहीं है बल्कि इसके लिए चीन और भारत दोनों की सहमति होनी जरूरी है। मौजूदा हालात में यह कहां तक संभव हो पाएगा, यह विचारणीय है।
-पद्श्री अनूप साह, जाने माने फोटोग्राफर और पर्वतारोही 

हर वर्ष एक हजार से अधिक लोग कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते हैं, लेकिन इस बार कोरोना के कारण यात्रा शुरू नहीं होने से करोड़ों का नुकसान निगम को उठाना पड़ा है। यात्रा शुरू होती है तो जिले में स्थित केमएवीएन के गेस्ट हाउसों की करोड़ों की आय होगी और यात्रा से जुड़े पौनी-पोर्टर्स, वाहन संचालकों और स्थानीय व्यापारियों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। यदि सांसद बलूनी के प्रयासों से यात्रा का विस्तार होता है तो यह सोने में सुहागा होगा। पर्यटन की दृष्टि पिथौरागढ़ के लिए यात्रा का बड़ा महत्व है। यात्रा नहीं होने से लोग सीमांत को भूल चुके हैं।
-दिनेश गुरुरानी, अध्यक्ष कुमाऊं मंडल विकास निगम कर्मचारी महासंघ 
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