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राजनीति में असरदार होती हैं कविताएं

बद्री नारायण Published by: बद्री नारायण Updated Sun, 27 Sep 2020 05:15 AM IST
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राजनीति में कविताएं

पहले कविता स्वान्तः सुखाय लिखी जाती थी। गोस्वामी तुलसीदास ने पूरी रामकथा स्वान्तः सुखाय ही लिखी थी। उन्होंने लिखा भी है, स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा। मध्यकाल में अनेक संत कवि यथा तुलसीदास, सूरदास, स्वामी हरिदास, कबीरदास, रविदास आदि अपने भावों को कविता में रचकर गाते थे। वे कभी अकेले, तो कभी संगत-पंगत में बैठकर खंजड़ी बजा स्वरचित कविताओं का पाठ करते थे। वे छपने के लिए शायद ही लिखते थे। वैसे भी उस वक्त प्रिंटिंग प्रेस एवं छपित संस्कृति का जमाना नहीं आया था। बहुत होता था, तो काव्य रचनाओं की हस्तलिखित प्रतिलिपियां घरों में पाई जाती थीं। 'प्रिंट पूंजीवाद’ के उभार के बाद छपने की संस्कृति का व्यापक विकास हुआ। ऐसे में कविता लिखने का मुख्य ध्येय छपना एवं छपकर पाठकों के पास पहुंचना हो गया। अखबारों, पत्रिकाओं में कविताएं छपने लगीं।



औपनिवेशिक काल में साहित्यिक पत्रिकाओं का जो चलन शुरू हुआ, वह आज तक बदस्तूर जारी है। खालिस कवि छपने के लिए कविताएं लिखने लगे, कविताओं से अपनी बातें समाज तक पहुंचाने लगे। साहित्यिक कवियों का एक वर्ग पैदा हुआ, जो मूलतः छपने की संस्कृति का हिस्सा था और कभी-कभी लोकप्रिय कवि गोष्ठियों में भी शामिल होता था। इनके साथ ही मंचीय कवियों का एक वर्ग सक्रिय था, जो अपनी कविताओं को लोकप्रिय संवाद बनाकर जनता से जुड़ने में लगा था।  चाहे साहित्यिक कवि हों या मंचीय, उन्होंने कविताएं तो लिखीं, पर उनसे ज्यादा काम नहीं लिया। ज्यादा काम का तात्पर्य यहां यह है कि शादी, ब्याह, जन्मदिन, प्रेम, बिछोह, खुशी के क्षणों में अपनी कविता अपने इष्ट-मित्रों एवं चाहने वालों को भेजना। मंच पर कविता पढ़ने वाले कवि छपने वाले कवियों की तुलना में अपनी कविताओं से ज्यादा काम लेते हैं। छपने वाले कवियों के पाठक उनकी कविताओं का इस्तेमाल अपने से जुड़े स्फेयर में करते रहते हैं।


राजनीति में सक्रिय कवि अपनी कविता से सबसे ज्यादा काम लेते हैं। वे अपने भाषणों में अपनी कविता तो उद्धृत करते ही रहते हैं, संवाद पत्रों एवं अपने समर्थकों को वितरित की जाने वाली पुस्तकाओं, विशेष अवसरों पर भेजे जानेवाले पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्रों में भी अपनी कविताओं का इस्तेमाल करते हैं। आज के सोशल साइट्स के दौर में विशेष अवसरों के लिए भेजे जाने वाले अपने संदेशों में भी, जो वे ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम से भेजते हैं, अपनी कविताएं उद्धत करते हैं। आजादी के पहले और बाद में राजनीति में सक्रिय हिंदी के अनेक कवि, यथा रामनरेश त्रिपाठी, रामधारी सिंह 'दिनकर' अपनी कविताएं अपने भाषणों, संदेशों और प्रतिक्रियाओं में तो उद्धृत करते ही थे, उनकी राजनीतिक कविताएं अपने समय का नारा भी बन जाती थीं। 'दिनकर' की कविता पंक्ति, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है राजनीतिक आंदोलनों का एक लोकप्रिय नारा ही बन गई। 1970-80 के दशक में हिंदी के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा जब कांग्रेस की राजनीति से जुड़े, तो उनकी काव्य शक्ति का उपयोग कांग्रेस की लोकप्रिय राजनीति के लिए शक्तिवान नारे गढ़ने में हुआ। 'गरीबी हटाओ' का जो नारा 1970-80 के दशक में कांग्रेस को सत्ता में लाने वाला नारा बना, उसे गढ़ने में श्रीकांत वर्मा की बड़ी भूमिका थी।


अटल बिहारी वाजपेयी कवि थे और बड़े राजनेता भी। उन्होंने राजनीतिक मंचों से कई बार अपनी कविताओं का पाठ कर जनता को अपने से जोड़ा था। वह पांचजन्य, राष्ट्रधर्म या अन्य अखबारों में लिखे आलेखों में अपनी कविताओं का उपयोग तो करते ही थे,  बताया जाता है कि वह अपने कार्यकर्ताओं से किए जाने वाले पत्र संवादों में भी मनोबल बढ़ाने वाली अपनी कविताएं उद्धृत करते थे। उनके जमाने में सोशल साइट्स नहीं थे, पर उपलब्ध संवाद के स्रोतों को वह अपनी कविताओं से जोड़ते रहते थे।


नरेंद्र मोदी सरकार में वर्तमान शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक', जो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, मूलतः कवि हैं। उनके अनेक कविता संकलन प्रकाशित हैं। वह भी अपने राजनीतिक संवादों में अपनी कविताओं का इस्तेमाल करते है, साथ ही, ट्विटर, फेसबुक तथा अनेक सोशल साइट्स पर भेजे जाने वाले  संक्षिप्त संवादों में भी अपनी कविताओं की पंक्तियां उद्धत करते है। कई बार सुप्रभात के साथ ही सोशल साइट्स पर उनकी कविताएं वायरल हो रही होती हैं। अपने को कम मत आंको या हर दुख लगे जग में मेरा है जैसी उनकी काव्य पंक्तियां साइबर स्पेस में तैर रही होती हैं। कवि कुमार विश्वास अपने चुनावी भाषणों में अपनी कविताओं से संवाद का काम लेते रहते हैं।


जो राजनेता कविताएं नहीं लिखते, वे भी अपनी बातों में असर पैदा करने के लिए कई बार प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का इस्तेमाल करते हैं। नरेंद्र मोदी, प्रियंका गांधी, अरविंद केजरीवाल अनेक बार अपने संभाषणों में कविताओं एवं शायरी का उपयोग करते हैं। रामधारी सिंह 'दिनकर', धर्मवीर भारती, दुष्यंत कुमार जैसे कवियों की कविताएं राजनीतिक संवादों को जन-मन की भावनाओं से जोड़ने का काम करती है। एक बार बिहार में एक दलित औरत के साथ किसी ने व्यभिचार किया। उससे दुखी होकर तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गुलाम सरवर ने, जो शायर भी हैं, एक कविता लिखी, जो उस घटना के तुरंत बाद अखबारों में छपी। लालू यादव तब बिहार के मुख्यमंत्री थे। कहते हैं कि अपराधी को गिरफ्तार कराने के बाद लालू यादव ने गुलाम सरवर को फोन किया कि आपने इसके खिलाफ कविता लिखी और मैंने कार्रवाई की। कई बार कविता हमारे हृदय में पहुंचकर हमें जगाती है, तो कई बार गलत के विरुद्ध कार्रवाई के रूप में आकर खुद कविता बन जाती है।

 

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