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कमजोर हो जाएगा एमएसपी सुरक्षा कवच, कैसे ये बता रहे हैं पी चिदंबरम

पी. चिदंबरम Published by: पी. चिदंबरम Updated Sun, 27 Sep 2020 05:14 AM IST
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farmers - फोटो : PTI
मुझे ये आंकड़े (इनमें से कुछ पुराने भी हैं) नेशनल सैंपल सर्वे से मिले।


फसल*                 स्थानीय निजी दुकानदार                 मंडियां                   सरकार एजेंसी           प्रसंस्करण          


धान                              65.94                                     19.46                     9.49                        1.70


गेहूं                               58.42                                     34.78                     6.79                        0.27


मक्का                           69.21                                     29.66                     0.56                        0.28


सरसों                            54.61                                     45.83                     0.44                        0.22


चना                              52.82                                    46.80                     0.38                        0.00
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सोयाबीन                        52.15                                    46.72                     1.36                        0.11


उड़द                            73.96                                     25.45                     0.80                        0.00


अरहर                           50.78                                      47.88                   0.22                        0.00


मूंगफली                      65.75                                         27.83                  3.82                        0.00


(* जुलाई-दिसंबर 2012 या जनवरी-जून 2013) 


विभिन्न राज्यों में दशकों से काम कर रहे कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) कानूनों के बावजूद अधिकांश किसानों ने अपनी उपज स्थानीय दुकानदारों को बेची। धान और गेहूं के मामले में साठ फीसदी किसान इसी श्रेणी में आते हैं। आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि केवल 1.24 करोड़ धान के किसानों (2019-20 में) और 43.35 लाख गेहूं (2020-2021 में) के किसानों ने एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर उपज बेची।


एपीएमसी :  खूबियां और कमियां

कारण स्वाभाविक हैं। 85 फीसदी किसानों के पास छोटी जोत है-एक हेक्टेयर से कम-और उनके पास बेचने के लिए बहुत कम सरप्लस होता है। दूर स्थित एपीएमसी मंडियां आर्थिक रूप से अच्छा विकल्प नहीं हैं। कुछ बोरा अनाज के लदान और परिवहन की लागत, मंडी में इंतजार करना, शुल्क अदा करना और दो दिन बाद भुगतान प्राप्त करना, यह सब छोटे किसानों की सीमा से परे है। स्थानीय व्यापारी सीधे खेत से उपज खरीदने और एक बार में भुगतान करने के लिए एक भरोसेमंद साथी होता है, भले ही वह एमएसपी से कम कीमत क्यों न देता हो।



हालांकि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में एपीएमसी मंडियां महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं, जहां बेचने के लिए सरप्लस भारी मात्रा में होता है। इन दोनों राज्यों में धान और गेहूं की उपज का 75 फीसदी सरकारी एजेंसियां खरीदती हैं। कुछ विद्वानों का तर्क है कि अन्य राज्यों में मंडियों की संख्या पर्याप्त नहीं है और वे किसानों की पहुंच से काफी दूर भी हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में 36 जिलों में 283 मंडियां हैं, यानी औसतन आठ प्रति जिला और 2019-20 में इनका कुल टर्न ओवर था महज 129.76 करोड रुपये। महाराष्ट्र में 326 मंडियां हैं और किसानों को औसतन 25 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।


इसमें संदेह नहीं कि एपीएमसी अधिनियम कृषि उपज के मुक्त व्यापार को प्रतिबंधित करते हैं, लेकिन मंडियां उनके लिए सुरक्षा कवच का काम करती हैं। पंजाब और हरियाणा में मंडी शुल्क संग्रह राज्य के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान करता है, जिसका उपयोग कृषि तथा ग्रामीण ढांचे के विकास में किया जाता है। फिर भी, मेरा मानना है कि एपीएमसी अधिनियमों को समय के साथ-साथ मुक्त व्यापार से लैस विविध तरह के और आसानी से सुलभ बाजारों को विकसित करने में मदद करनी चाहिए।


कांग्रेस का घोषणापत्र बनाम भाजपा के विधेयक


कांग्रेस के 2019 के घोषणापत्र ने क्या वादा किया था, जरा उस पर गौर करें। इसने वादा किया था, कि 'किसान उत्पादक कंपनियों/संगठनों को प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि वे इनपुट, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए किसानों को सक्षम बना सकें' और 'बड़े गांवों तथा छोटे कस्बों में पर्याप्त ढांचे के साथ किसानों का बाजार स्थापित कर सकें, ताकि किसान अपनी उपज पूरी आजादी के साथ ऐसे बाजारों में ला सकें।' कांग्रेस के वादे की आत्मा यही थी कि देश भर में हजारों बाजार स्थापित हो सकें। ऐसे बाजार राज्य सरकार, स्थानीय पंचायत, को-ऑपरेटिव सोसाइटी या लाइसेंसशुदा निजी इकाई द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं। उन्हें हल्के से नियंत्रित किया जाएगा और नियमित किया जाएगा कि बाजार में होने वाले हर लेन-देन में एमएसपी से कम का भुगतान नहीं होगा। एपीएमसी अधिनियमों को निरस्त करने का प्रस्ताव स्वाभाविक रूप से आसानी से सुलभ विविध बाजारों की स्थापना की दिशा में अगली कड़ी होता।


इसके विपरीत मोदी सरकार ने तो एमएसपी के सुरक्षा कवच को ही कमजोर कर दिया और सार्वजनिक खरीद को कम कर दिया। किसान सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें भय है कि एमएसपी को खत्म किया जा सकता है। राज्य सरकारें चिंतित हैं कि इससे सार्वजनिक खरीद और जन वितरण प्रणाली बाधित हो जाएगी। खाद्य सुरक्षा के तीनों स्तंभों को कमजोर कर दिया गया, तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत स्थापित की गई खाद्य सुरक्षा व्यवस्था ढह जाएगी।


मोदी सरकार के कानून हजारों वैकल्पिक बाजार का निर्माण नहीं करेंगे। इसके बजाय वे कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देंगे और कॉरपोरेट के प्रवेश के लिए दरवाजे खोल देंगे और अंततः कारटेल्स (निहित स्वार्थी गठजोड़) का प्रवेश हो जाएगा। ऐसे ताकतवर खरीदारों के बरक्स छोटे और मझोले किसानों के पास मोलभाव या अनुबंध करने की समान शक्ति नहीं होगी और नए कानूनों के तहत दोषपूर्ण विवाद समाधन तंत्र किसान को बर्बाद कर देगा। 


एक और खोखला वादा


कृषि मंत्री ने संसद को बताया कि नए कानूनों का एमएसपी से कोई लेना देना नहीं है। यह अक्षरशः सत्य है! फिर भी, वह कहते हैं कि सरकार किसानों को एमएसपी की गारंटी देगी। यह बेतुका-सा वादा है। सरकार यह कैसे जानेगी कि किस किसान ने किस खरीदार को कौन-सी उपज बेची? यदि हर निजी लेन-देन के लिए एमएसपी को अनिवार्य करने का इरादा था, तो फिर इन विधेयकों में यह उपखंड क्यों शामिल नहीं किया गया कि खरीदार द्वारा किसान को दी गई कीमत अधिसूचित एमएसपी से कम नहीं होगी?


जिस तरह से नोटबंदी एक आपदा थी और 2017-18 के बाद से आर्थिक कुप्रबंधन विनाशकारी बना हुआ है, कृषि संबंधी दोनों बिल, जो कि कानून बन जाएंगे भारतीय कृषि समुदाय और कृषि अर्थव्यवस्था को कमजोर कर देंगे। ये राज्यों के अधिकारों और संघवाद को नुकसान पहुंचाएंगे। यह स्पष्ट दिखता है कि मोदी सरकार समझती है कि वह सारे लोगों को हर समय बेवकूफ बना सकती है।


 

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