क्या मृत्यु के पार भी कोई जीवन है, जिसे अनुभव किया जा सकता है? इन प्रश्नों पर तीन हजार साल पहले विमर्श हुए। इन प्रश्नों पर पश्चिमी दार्शनिकों ने पिछली कुछ शताब्दियों में विमर्श किए और विज्ञान खासकर गणित को विचार के पास रखा। बीसवीं सदी में विज्ञानियों के बीच इन दार्शनिक प्रश्नों ने प्राथमिकता अर्जित कर ली और गणित के साथ आकाश विज्ञान और क्वान्टम भौतिकी को साथ लेकर सोचा गया। इसी दौरान इन प्रश्नों पर बौद्ध साधकों व आधुनिक विज्ञान या फिर कश्मीर के शैव दर्शन और विज्ञान के बीच संवाद हुए। कुछ साल पहले सारनाथ में एक अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद में विज्ञानी व बौद्ध साधकों ने इन प्रश्नों पर विमर्श किया था, जिसमें दलाई लामा भी मौजूद थे।
क्या कला को इस तरह के संवाद की जरूरत नहीं है? क्या कलाकार के पास कोई जीवन दृष्टि नहीं होती? कला के प्रश्नों को लेकर सुकरात ने एक समकालीन युवा दार्शनिक इऑन से बात की थी। कान्ट ने सौंदर्य पर एक किताब लिखी, क्रिटीक ऑफ जजमेंट। रूसो ने सौंदर्य पर जो सोचा, वह देरिदा के विचार के लिए प्रस्थान बिंदु बना। पर बुद्ध से लेकर प्लेटो ने अपने संघ या अकादमी में कवि या कलाकार के लिए कोई जगह सुनिश्चित क्यों नहीं की? क्या नाट्यशास्त्र या चित्रसूत्रम ऐसे प्रश्नों को सुलझाते नहीं हैं? यदि वेद सुलझाते हैं, तो फिर नाट्यशास्त्र तो पंचम वेद है।
तो फिर किसी कलाकार ने कभी पंचम वेद को इस दृष्टि से क्यों नहीं देखा, जहां दार्शनिक प्रश्नों को सुलझाने का कोई मार्ग हमें सौंपा गया हो? नंदलाल बसु ने दृष्टि और सृष्टि किताब लिखी थी। राम कुमार ने काशी पर पेंटिंग शृंखला बनाई। सत्यजित राय ने अपराजितो जैसी फिल्म बनाई। बर्गमैन, ब्रेसां, तारकोव्स्की और क्रिस्टफ किस्लोव्स्की ने आध्यात्मिक अवसाद और जिज्ञासाओं को लेकर क्लासिक फिल्में बनाईं। बर्गमैन की फिल्म थ्रू ए ग्लास डार्कली का शीर्षक ही बाइबिल से है। पिछले साल विदा हुए दक्षिण कोरियाई फिल्मकार किम की डुक की चर्चित फिल्म स्प्रिंग, समर, फॉल विंटर ऐंड स्प्रिंग का आरंभ ही बौद्ध देशना से होता है। दोस्तोव्स्की, टॉलस्टॉय, रिल्के और बोर्खेज का जीवन ही इन जीवन प्रश्नों से जूझने में बीता। रवींद्रनाथ की गीतांजलि इसी आशय से की गई प्रार्थना है। प्रेमचंद की कहानी आत्मसंगीत विश्व की सर्वोत्तम कहानी है, जो जीवन संगीत सुनने के सहज रास्ते को सहज शैली में कह देती है। निर्मल वर्मा, अज्ञेय, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल के रचना फलक इन जीवन प्रश्नों को गहरी निगाह से परखते हैं। रिल्के अपनी किताब लव पोएम्स टू गॉड में ईश्वर से सीधे संवाद करते हैं। अपनी लंबी कविता आमी में रवींद्रनाथ ने स्पष्ट कहा है कि मेरी ही चेतना के कारण चीजों के रंग वैसे हैं, जैसे दिख रहे। ऐसी स्पष्टता को लेकर ही उनका संवाद आइंस्टीन के साथ हुआ।
पर बौद्ध दर्शन या शैव दर्शन एवं विज्ञान के बीच लगातार हो रहे गहरे संवादों में यदि कलादृष्टि या कविदृष्टि अभी तक शामिल नहीं हुई है, तो इसका कारण यह हो सकता है कि या तो कला या कलाकारों की दृष्टि की ओर ध्यान नहीं जा सका है, या फिर अब भी जीवन प्रश्नों की विमर्श दुनिया में कला के महत्व को स्वीकारा नहीं गया है। क्या इसका एक कारण यह है कि कलाकार स्वयं इस संवाद में खुद नहीं आता? उसे जरूरत नहीं पड़ती कि वह गद्य की शैली में अपनी बात रखे। जबकि हम पाते हैं कि हजारीप्रसाद द्विवेदी से वासुदेवशरण अग्रवाल और विलियम ब्लेक से कोलरिज तक सब ने गद्यात्मक मुद्रा में अपने उत्तर को अंतर्निहित रखा। निर्मल वर्मा और अज्ञेय ने भी कई लेख इसी अभिप्राय से लिखे। बाशो ने तो अल्पाक्षरों से रचित अपनी कविताओं में जीवन का सारांश लिखा।
पांच दशक पहले भौतिक विज्ञानी डेविड बॉम ने रेने वेबर के साथ मिलकर जीवन प्रश्नों पर दुनिया के शीर्षस्थ विज्ञानियों और दार्शनिकों से साक्षात्कार लिए थे, जिनमें स्टीफन हॉकिंग, जे कृष्णमूर्ति व लामा अंगारिका गोविंदा भी थे। पर दर्शन और विज्ञान के साथ कला का अनुशासन कभी न जुड़ सका। साहित्य या कला को दूसरे दर्जे में देखने की मानसिकता के कारण ही जब सार्त्र को साहित्य में नोबेल पुरस्कार दिया गया, तो उन्होंने यह कहते हुए उसे अस्वीकारा कि वह दार्शनिक हैं, लिहाजा उन्हें दर्शन के क्षेत्र में यह सम्मान दिया जाना चाहिए। नोबेल लेखक अल्बैर कामू ने भी ऐसा ही किया था। हमें आंख खोलकर देखना होगा कि कला दृष्टि की अनदेखी कर हम किस मूल्यवान दृष्टि संपदा की अनदेखी करते चले जा रहे हैं।