भारत एक साथ तीन मोर्चों पर जंग लड़ रहा है-कोविड-19, जिसके संक्रमण कम होने के कोई संकेत अभी नहीं दिखते, भारी बेरोजगारी के साथ तबाह अर्थव्यवस्था और भारत व चीन के बीच दशकों बाद भीषण हिंसक सीमा संघर्ष, जिसने हमारे 20 बहादुर सैनिकों की जान ले ली। इस परिदृश्य में भारत के बच्चों का क्या होगा, जो हमारा भविष्य हैं?
उनमें से सबसे कमजोर की दुर्दशा की सुध कौन ले रहा है? और यह हमारे विमर्श का प्रमुख मुद्दा क्यों नहीं है? हमारे देश में बच्चों की आबादी 47.2 करोड़ है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। हमारे देश में दुनिया के कुछ सबसे भूखे और कुपोषित बच्चे रहते हैं। यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन 2019 के अनुसार, भारत में पांच वर्ष तक के बच्चों में 69 फीसदी मौतों का कारण कुपोषण है।
कोविड-19 ने लाखों गरीब बच्चों की हालत और बदतर बना दी है। तालाबंदी के दौरान स्कूल बंद होने से सरकारी स्कूलों में जाने वाले बच्चों को अब मुफ्त, गर्म पका हुआ मध्याह्न भोजन नहीं मिल रहा है, जो उन्हें हर दिन मिलता था। इसके बदले उन्हें कच्चा राशन दिया जाता है। आंगनवाड़ियां भी ज्यादातर बंद रहती हैं। स्पष्ट है कि इस आकस्मिक व्यवधान से गरीब समुदायों में बाल कुपोषण और गहरा जाएगा, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य और कल्याण पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
केंद्र और राज्य सरकारों ने लोगों की भूख को कम करने के लिए कई उपायों की घोषणा की है। हालांकि, इन उपायों में से अधिकांश आम जनता के लिए हैं। बच्चे उपेक्षित नागरिक बने रहे हैं। ऐसा क्यों है? इसका एक कारण यह है कि वयस्कों के विपरीत, बच्चे आमतौर पर अपनी दुर्दशा को उजागर करने की स्थिति में नहीं होते हैं, जैसा कि दीपा सिन्हा कहती हैं, जो दिल्ली के अंबेडकर विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं और सक्रिय रूप से नागरिक समाज के नेतृत्व वाले खाद्य अभियान से जुड़ी हैं।
मार्च 2018 में झुंझुनू, राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन) देश भर में पोषण संकेतकों में सुधार लाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन महामारी ने कई पहलों को पटरी से उतार दिया है।
इस वर्ष मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों से एक समान नीति बनाने के लिए कहा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोविड -19 के प्रसार को रोकने के प्रयासों में बच्चों को पोषण आहार देने और नर्सिंग और स्तनपान कराने वाली माताओं की योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद देश भर में एक समान नीति नहीं बनाई गई।
केरल, जिसकी मध्याह्न भोजन योजना देश में सबसे सफल योजनाओं में से एक है, आंशिक रूप से अपनी दीर्घकालीन कल्याणकारी नीतियों के कारण, उन बच्चों को मध्याह्न भोजन वितरित कर रहा है, जिनके स्कूल कोविड-19 के कारण बंद हो गए हैं। देश के कुछ गरीब राज्य भी ईमानदारी से इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
वर्ष 2017 में झारखंड सुर्खियां में था, क्योंकि एक 11 वर्षीय लड़की की स्कूल की छुट्टियों के दौरान भूख से मौत हो गई, जब दोपहर का भोजन उपलब्ध नहीं कराया गया। आदिवासी महिला नेटवर्क की अध्यक्ष एलिना होरो कहती हैं कि 'आज सिमडेगा जैसे झारखंड के कई हिस्सों में स्कूल यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि गरीब बच्चे भूखे न रहें। शिक्षक बच्चों के घर पर राशन पहुंचा रहे हैं।'
छत्तीसगढ़ में राइट टू फूड अभियान के साथ काम करने वाली संगीता साहू का कहना है कि स्कूलों के बंद होने के बाद, राज्य सरकार ने कार्यदिवस के लिए 40 दिनों के लिए कच्चा राशन उपलब्ध करवाया और गर्मी की छुट्टी के 45 दिनों के लिए अतिरिक्त चावल, दाल, सोया चंक्स, अचार, तेल और नमक उपलब्ध कराया।
साहू बताती हैं कि राइट टू फूड अभियान ने मार्च में उच्च न्यायालय में बच्चों के लिए भोजन की मांग करने वाले अन्य समूहों के साथ, जो सामान्य रूप से मध्याह्न भोजन और आईसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवा-दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी-सहायता प्राप्त बचपन विकास कार्यक्रम है) से लाभान्वित होते हैं, एक जनहित याचिका दायर की थी और इससे राज्य सरकार पर दबाव बनाए रखने में मदद मिली है।
एक बेहद चिंताजनक मुद्दा तालाबंदी के दौरान पोषण पुनर्वास केंद्रों का बंद होना है। ये केंद्र सबसे गंभीर कुपोषित बच्चों का ख्याल रखते हैं। राइट टू फूड अभियान से जुड़े कार्यकर्ता और कई अन्य लोग, विकास निगरानी और टीकाकरण सेवाओं को फिर से शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं, जिसमें उन कुपोषित बच्चों का पता लगाना भी शामिल है, जो गंभीर रूप से कुपोषण पीड़ित हैं।
वे कहते हैं कि सरकार को गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पोषण और ऊर्जा से भरपूर भोजन और पूरक पोषण / मध्याह्न भोजन बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं और किशोरियों को उपलब्ध कराना चाहिए।
हाल ही में जारी यूनिसेफ की एक वस्तुस्थिति की रिपोर्ट बताती है कि छत्तीसगढ़ में पोषण पुनर्वास केंद्रों से छुट्टी पाने वाले बच्चों का टेलीफोन के जरिये लगातार हालचाल पूछा जाता है। महाराष्ट्र में सहायक नर्स मिडवाइव्स तीन साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के साथ व्हाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से संपर्क में रहती हैं, ताकि घर पर संपर्क करने के कारण संक्रमण से बचा जा सके।
कार्यकर्ताओं का आग्रह है कि वायरस के प्रसार को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ महत्वपूर्ण विकास निगरानी, टीकाकरण, पका हुआ भोजन और पोषण संबंधी परामर्श सेवाएं प्रदान करने के लिए सरकार तुरंत महामारी के दौरान समेकित बाल विकास कार्यक्रम को एक आवश्यक सेवा के रूप में मान्यता दे और फिर से आंगनवाड़ी केंद्रों को शुरू करे और कोविड महामारी के कारण स्कूल बंद होने के दौरान मध्याह्न भोजन योजना के जरिये प्रत्येक बच्चे को गर्म, पका हुआ भोजन प्रदान करे, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गरीब बच्चों को प्रतिदिन कम से कम एक बार पूरा भोजन मिले और कुपोषण और न बढ़े। लेकिन क्या सरकारें इस दिशा में आगे कदम उठाएंगी?