अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला की हालिया घटना सोशल मीडिया पर चर्चा के केंद्र में है, जहां अरुणाचल प्रदेश स्काउट के कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) द्वारा जवानों के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए पुलिसकर्मियों को चेतावनी दी गई। इस घटना के बाद इंडियन सिविल एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (आईसीएएस) के अध्यक्ष ने रक्षा सचिव को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप करने और सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। इस घटना में यूनिट के दो जवान शामिल थे, जो विगत दो नवंबर को बुद्ध महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए गए थे। उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और बुरी तरह से पीटा, जबकि उन लोगों ने बताया कि वे सेना के जवान हैं। इस संबंध में कई तरह की खबरें आ रही हैं। पुलिस का दावा है कि जवान शराब के नशे में थे और दुर्व्यवहार कर रहे थे, जबकि सेना का दावा कुछ और है। तथ्य यह है कि वे जवान इतने घायल कि उन्हें इलाज के लिए भर्ती करना पड़ा। इससे संबंधित तस्वीरें और मेडिकल रिपोर्ट सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही हैं।
घटना के बाद सेना ने एक अधिकारी और कुछ जवानों को भेजा, जिन्होंने घायल जवानों को अस्पताल में भर्ती कराया। जवानों की पिटाई से सीओ नाराज थे, इसलिए वह खुद थाने गए तथा एसएचओ से बात की। सोशल मीडिया पर बार-बार एक वीडियो प्रसारित हो रहा है, जिसमें दिखाया गया है कि सीओ पुलिस को फिर से जवानों को न पीटने की चेतावनी दे रहे हैं। बाद में वह एसपी से भी मिले। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सीओ के साथ गए सैनिकों ने वाहनों और पुलिस की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया तथा पुलिसकर्मियों को पीटा भी। पर इन रिपोर्टों में इसका जिक्र नहीं है कि जब सीओ और एसपी बात कर रहे थे, तब पुलिसकर्मियों ने अभद्र भाषा का प्रयोग कर सैन्यकर्मियों को उकसाया। स्थिति को संभालने के लिए तुरंत सीओ और एसपी बाहर निकले। आईसीएएस अध्यक्ष के पत्र में यह भी दावा किया गया है कि जिलाधिकारी (डीएम) ने जब सैन्यकर्मियों को वहां से जाने के लिए कहा, तब उन्हें भी अपमानित किया गया।
पुलिस को किसी भी व्यक्ति पर हाथ उठाने का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह सैनिक हो या आम नागरिक। अगर हमला इतना गंभीर था कि जवानों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, तो कानूनन पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। दूसरी बात, कानून के मुताबिक, सैन्यकर्मियों को उनके उच्चाधिकारियों को सौंपा जाना चाहिए था। उन्हें हिरासत में बंद करना गैरकानूनी था। तीसरी बात, अगर पुलिस ने गलती की है, जिसकी तरफ सेना ने बाद में इशारा किया था, तो गलतियों को स्वीकार करना चाहिए था।
सेना में अपने जवानों की भलाई के लिए सीओ जिम्मेदार हैं। अगर वह अपनी जिम्मेदारी की अनदेखी करते हैं, तो यूनिट का ढांचा गड़बड़ा जाएगा। सेना के जवान अपने झंडे और साथियों (जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सीओ होता है) की रक्षा के लिए जान देने के लिए तैयार रहते हैं। इसलिए अगर उसके साथियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, तो सीओ चुप नहीं रह सकते। इसलिए परिपक्वता दिखाते हुए वह एसएचओ से मिलने के लिए थाने गए, जो कि पद में उनसे नीचे होता है। इसका कारण यह था कि वह संदेश देना चाहते थे कि इस बार तो उन्होंने कार्रवाई नहीं की, लेकिन आगे अगर ऐसी गलती दोहराई गई, तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा। अंततः पुलिस और सेना का क्षेत्र में मिलकर रहना ही श्रेयस्कर है।
सैन्यकर्मियों ने पुलिसकर्मियों पर जिस तरह हमला किया, वह भी गलत था। सीओ को पहले ही अपने लोगों को उत्तेजित होने से बचने की चेतावनी देनी चाहिए थी, क्योंकि अपने सहयोगियों की पिटाई से वे पहले से ही नाराज थे। यह संभव है कि सीओ को संभावित उकसावे की उम्मीद न रही हो। इसे बाद में सुलझा लिया गया। हालांकि यह मामला इतना गंभीर नहीं था कि आईसीएएस को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया देनी पड़े। केंद्र सरकार के अन्य संगठनों ने ट्वीट्स के जरिये इसका समर्थन किया। आईसीएएस अध्यक्ष का पत्र जारी करना और दूसरों द्वारा इसका समर्थन करना बताता है कि नौकरशाही और सशस्त्र बलों के बीच विभाजन बढ़ गया है। वह पत्र एकतरफा था, जिसका उद्देश्य जिलाधिकारी और उनके कर्मियों का बचाव था, जबकि पूरा दोष सेना पर मढ़ा गया। उसमें स्थानीय पुलिस की मनमानी का जिक्र तक नहीं किया गया।
दूसरी तरफ सेना ने गरिमा और चुप्पी बरकरार रखी, क्योंकि यह अब भी अनुशासित संगठन है। सीओ द्वारा उठाए गए कदम अपने जवानों के प्रति उनकी जिम्मेदारी में परिलक्षित होता था। सोशल मीडिया पर आईएएस लॉबी के बजाय सेना के प्रति समर्थन दिखा।
एक बड़ा तथ्य, जिसकी अनदेखी की गई, कि इस क्षेत्र में सेना 70 वर्षों से ज्यादा समय से तैनात है, लेकिन एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई। राज्य प्रशासन या पुलिस की तुलना में स्थानीय लोग सेना का ज्यादा सम्मान करते हैं, क्योंकि वह स्थानीय लोगों का समर्थन करती है। वह तभी कार्रवाई करती है, जब इसके जवानों की बर्बरतापूर्वक हत्या होती है या जवानों का अपमान किया जाता है।
इस मामले में रक्षा मंत्रालय की सक्रियता और प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है। रक्षा मंत्री ने गृह राज्यमंत्री के साथ उन सभी लोगों से मुलाकात की, जो इस घटना से जुड़े थे। अगर वह अपने जवानों के साथ खड़े सीओ के खिलाफ कार्रवाई करती हैं, तो वह एक बुनियादी गलती होगी, क्योंकि यह सेना-विरोधी पूर्वाग्रह का संकेत होगा। सेना प्रमुख उस चेटवुड सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध हैं, जिसके तहत पहले देश, फिर टीम और अंत में अपने हित की बात सोची जाती है। इसलिए वह अपने सीओ के साथ खड़े हैं, जिन्होंने अपने कमान की बेहतरी के लिए काम किया। अगर राज्य सरकार पुलिस या डीएम के खिलाफ कार्रवाई करती, तो इससे आईसीएएस नाराज होती। इस जटिल परिस्थिति में जांच का आदेश देना ही एकमात्र विकल्प था।
जांच चाहे अकेले या संयुक्त रूप से किया जाए, दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश की जाएगी और वर्षों तक कुछ भी नहीं होगा। राज्य और सेना, दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। इसलिए स्थिति जितनी जल्दी सामान्य बनाई जाए, उतना ही बेहतर होगा।