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धर्म निरपेक्षता के नाम पर

तवलीन सिंह Updated Sun, 11 Nov 2018 05:54 PM IST
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तवलीन सिंह

मेरे हिंदू दोस्त अक्सर शिकायत करते हैं कि अपने देश में सेक्यूलरिज्म इतना उल्टा किस्म का है कि धार्मिक मामलों में सरकारें और न्यायालय उसी समय हस्तक्षेप करते हैं, जब मंदिरों की बात होती है या हिंदुओं की आस्था की बात होती है। मैंने इस शिकायत को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जब से सबरीमाला का विवाद शुरू हुआ है, तब से मैं इसे गंभीरता से लेने लग गई हूं।



सबरीमाला मंदिर में जवान महिलाओं का जाना सदियों से प्रतिबंधित है। उनके लिए पास में ही एक दूसरा मंदिर है। यह आस्था की बात है, सो किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। लेकिन जब बात सर्वोच न्यायालय तक पहुंची, तो इस परंपरा को अन्याय मानना ही पड़ा। इससे एक ऐसा विवाद शुरू हुआ है, जो अब रुकता नहीं दिखता, क्योंकि इसमें राजनीतिक दल और मीडिया वाले ऐसे जोश से कूद पड़े हैं, जैसे भारत देश में इससे बड़ी कोई समस्या ही नहीं है।


सबरीमाला का यह प्राचीन मंदिर पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है। लेकिन अभी तक किसी ने नहीं पूछा है कि अगर आस्था में इस तरह का हस्तक्षेप जायज है, तो मस्जिदों में महिलाओं को इबादत करने की इजाजत अभी तक क्यों नहीं मिली? जब पिछले सप्ताह दारूल उलूम से फतवा जारी हुआ कि मुस्लिम महिलाओं को नेल पॉलिश पहन कर नमाज नहीं पढ़नी चाहिए, तो इसे किसी ने अन्याय क्यों नहीं माना? बराबर के अधिकार धार्मिक स्थानों में अनिवार्य हो गए हैं, तो मस्जिदों में क्यों नहीं हुए हैं? ऐसे सवाल करनेवालों को प्रगति की लड़ाई लड़ने वाले वे राजनीतिज्ञ सांप्रदायिक क्यों कहते हैं, जो आजकल सबरीमाला मुद्दे पर ऊंचे स्वर में बोल रहे हैं?


बात सिर्फ सबरीमाला के नियमों में हस्तक्षेप की होती, तो फिर भी शायद ठीक होती, लेकिन बड़े-बड़े हिंदू मंदिरों को सरकारों ने इस आधार पर अपने कब्जे में ले लिया है कि इन्हें भ्रष्ट महंतों के चंगुल से छुड़ाया जा रहा है। मंदिरों में चढ़ावा भी अब विवादित हो गया है, क्योंकि इसमें भी हस्तक्षेप करने की बात चल रही है। गुरुद्वारों को अगर एक चुनी हुई शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति चला सकती है, तो ऐसा ही प्रबंध मंदिरों के लिए क्यों नहीं किया जा सकता? कहने को तो यह छोटी बात है, लेकिन वास्तव में है नहीं। वाराणसी के  विश्वनाथ मंदिर पर बहुत साल पहले एक कांग्रेसी नेता का वर्चस्व हो गया था। हालांकि इस मंदिर की जो विशेष पूजाएं और अति विशेष आरती है, उनका अधिकार आज भी उन महंतों के परिवारों के पास ही है, जो सदियों से इस मंदिर की रक्षा करते आए हैं। क्या यह ज्ञान वे सरकारी अधिकारी प्राप्त कर सकेंगे, जो अब इस मंदिर को चलाते हैं? अगर सबरीमाला विवाद के बाद इस मंदिर को महंतों से छीनकर सरकारी अधिकारियों के हवाले कर दिया जाता है, तो क्या सबरीमाला की प्राचीन परंपराएं धीरे-धीरे समाप्त नहीं हो जाएंगी?


अंत में, यह कहना जरूरी हो गया है कि सेक्यूलरिज्म के नाम पर अपने भारत देश में बहुत सारी ऐसी चीजें हो रही हैं, जो किसी न किसी दिन इस शब्द को इतना बदनाम कर देंगी कि इस शब्द का नाम लेना ही मुश्किल जो जाएगा। सबरीमाला विवाद अब आस्था का मुद्दा न रहकर राजनीतिक मुद्दा बन गया है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी है, जो केरल में अपने कदम गाड़ने का प्रयास कर रही है, जबकि दूसरी तरफ वे वामपंथी राजनीतिक दल हैं, जो हर पांच साल बाद इस प्रदेश में सत्ता संभालते आए हैं।

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